युग अन्तक बैकुंठ शुक्ल

युग अन्तक बैकुंठ शुक्ल
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शहीदों शूरवीरों की शहादत याद आती है, फ़ना उन चंद पूतों की सदाकत याद आती है।
लूटाई मुल्क की खातिर जवानी जवानी जिंदगानी सब, महीं के उन दिनेशो की इबादत याद आती है। ।

मैं भव्या प्रभात चंद्रा भारतवर्ष में गद्दारों के निए दंडविधान का श्रीगणेश करनेवाले सूबे बिहार के दो वीर पुत्र ब्रह्मर्षि बैकुंठ शुक्ल और ठाकुर चन्द्रमा सिंह को आदरांजलि अर्पित करते हुए भारतीय गद्दार फणीन्द्रनाथ वध की अनकही गाथा पाठकों के लिए हिंदी काव्य के माद्यम से निवेदित करती हूँ।

मेरी इस कविता का शीर्षक है “युग अन्तक बैकुंठ शुक्ल”

जयचंद, कपूतों गद्दारों से आर्यावर्त बदहाल रहा गोरी से पृथ्वी लडे मगर कन्नौज नरेश से कौन भिड़ा?
जियाजी राव की गद्दारी से लक्ष्मीबाई हारीं थी दुष्ट गणोजी के भीतरघात से संभाजी को मात मिली।

मेरी गाथा के हरेक शब्द क्रांति की अमिट कहानी है गद्दार के संगदिल दण्डधर की ओझल अनभ्यस्त निशानी है।
यूँ तो राष्ट्रपिता के सात्विक विचारों ने हमें दिया सम्बल है किंतु सात लाख नेकात्माओं से प्राप्त स्वधीनतारूपी गंगा जल है।।

लालगंज और योगीडीह से गोरों को गहरा घाव मिला योगेंद्र किशोरी की जुगल जोड़ी से शास्त्र क्रांति को आकाश मिला,
रामदोनी, मुनेश्वर और बसावन ने विप्लवी तेवर दिखलाई थी, सुनीति भाभी रणचंडी बनकर मैदान ए जंग में आई थी।

वो पंद्रह मई सन सात की तारीख नभमंडल में भानु प्रखर, दीनानाथ के परम तेज से भागीरथी भी हुई थी शुभकर।
ऊध्र्वलोक से पृथ्वीलोक तक आबोहवा में ज्वाला थी, और गुलामी की बेड़ी में जकड़ी भारतमाता थीं ।।

थी भृगुपति की जयंती उस दिन अक्षय तृतीया का महापर्व, जलालपुर को लाल मिला और रामबिहारी को औरस।
वो परमवीर गंगा का बेटा रामपुर का शिक्षक था स्वाधीन सूर्य बैकुंठ शुक्ल ही इस भरतखंड का युग अन्तक था ।।

बहरी हुकूमत को जागने हेतु भागोवा ने बम संघान किया, एसम्ब्ली में सिंह-भार्गव ने बड़ा अनोखा काम किया।
फिर नाटक हुआ मुकदमें का हरकारों ने तब चाल चली भितरघाती के कारण ही आंगल सत्ता को जीत मिली।।

जयगोपाल ने मारे डर के लाहौर केस में गवाही दी, फणीन्द्र ने प्रलोभन में आकर इस भारत को बर्बादी दी।
शोभा, शादी और हंसराज ने अपने जमीर को बेच दिया, गद्दारों ने गोरों से मिल इंकलाबी रुत को तोड़ दिया।।

महामना के दो फॉर बयान पर बापू ने चुप्पी साधी थी जिन्ना के बिन आसफ की पैरवी आंगळ सत्ता पर हावी थी।
छिप गया सूर्य अस्ताचल में नेहरू प्रसाद खामोश रहे, उस नर नाहर का पक्ष देख लार्ड इडविन भी स्तब्ध हुआ।।

भेदी-छलियों के भितरघात से भारतमाता हारीं थी, तलवारों के बदले हमने हमने चरखा-तकली अपना ली थी।
धीरे धीरे वो दिन आया बलिवेदी पर चढ़ जाने को, स्वातन्त्र समर के गल्पों में स्वर्णिम अक्षर बन जाने को ।।

तेईस माच सन बत्तीस को वे वीर पुत्र सुरपुर गए, निर्णय का खूब विरोध हुआ और क्रांतिवीर भी क्रुद्ध हुए।
सांडर्स वध पर फनी की गवाही से सारे सपूत कुर्बान हुए, भारत माँ का आँचल उजडा, देशवासी अनाथ हुए ।।

राखी की कलाई चली गई शश्त्र क्रांति का दल टूट गया और बचे हुए सेनानी का क्रमण से नाता छूट गया।
इनर मैन के कारण युवा शक्ति का मनोबल टूट गया , जम्बूद्वीप के रणवीरों का सुन्दर सपना उजाड़ गया,।।

आजाद ने फिर परमान निकाला उस कालक को धोना था एचआरए के रणवीरों को क्रांति के पथ पर खोना था ।
भगवानदास-सदाशिवराव का प्रथम प्रयास बेकार गया, जलगांव कचहरी में फणीन्द्र वध का पूरा प्रकल्प बर्बाद गया ।।

फिर अक्षयवट राय ने हाजीपुर में गुप्त सभा बुलवाई थी, भितरघाती के विरुद्ध तय होनेवाली शायद वो प्रथम लड़ाई थी ।
फणीन्द्र वध के सत्कर्म का बीड़ा दोनों वीरों ने उठा लिया फिर बाबा हरिहर नाथ के उन भक्तों ने वैशली से विदा लिया ।।

चन्द्रमा संग बैकुंठ ने कुशेश्वर नाथ का ध्यान किया फिर श्यामा माई का दर्शन करके दरभंगा राज से कूच किया।
ग्रामीण गोपाल नारायण ने वीरों को धोती-साइकिल दी, भाई किशोरी ने हथगोले और काका ने फरसा भेंट किया।।

बेतिया के मीणा बाजार में उनको महासमर अब लड़ना था गद्दार फणीन्द्रनाथ को मारना या फिर उनको मरना था।
नौ नवंबर सन बत्तीस को क्रांति ने कृत्य विशेष किया, चन्द्रमा के साथ मिलकर बैकुंठ ने रणचंडी का अभिषेक किया।।

पहले गणेश प्रसाद निपटया फिर इनरमैन को क्षत-विक्षत किया परशु के अठारह वारों से बैकुंठ ने समर को शेष किया।।
चन्द्रमा सिंह के हालगोलों से पूरा बेतिया थर्राया था, और वन्दे मातरम् जयघोष के साथ बैकुंठ का परशु लहराया था ।

नौ नवंबर सन बत्तीस की तारिख बिहारी शेरों के नाम रही दोनों भूपों का महाशौर्य इंकलाब का ज्वलंत पैगाम रही।
अम्बु के प्रवेगमयी धार थे वे पापी फनिंद्र के यमराज थे स्वयं समभाष का कोप थे या महामार्तण्ड के अवतार थे।

दो महासूर्य पावक सरीखे के प्रचंडता के अमर इतिहास थे, अगम के व्योम या विस्तार पर वो कपाली कालिका के वार थे।।
सदी से सुप्त चम्पारण की धरा पर वे बाबा नर्मदेश्वर के प्रहार थे, यामल बनकर गद्दार को नर्क भेजनेवाले वे भृगुपति के अवतार थे।

भितरघाती के सहचर अंगरक्षक चन्द्रमा के हाथों खूब पिटे, इष्ट-मित्र और पहलवान शिवास्त्र के आगे नहीं टिके।
अगले कई दिनों तक पापी मौत के लिए तरसता था नौ नवम्बर से बीस नवम्बर तक अस्पताल में हर पल मरता था ।।

युग अन्तक ने उसको मारा जो माँ भारती का द्रोही था दोनों वीरों का महायुद्ध अखंड राष्ट्र के लिए समर्पित था।
कहो क्या कोई उनको भूल जाए? वे इंकलाब के नाद थे, जुल्म की हुकूमत पर पड़नेवाले बिहारी चटकनों के वार थे ।।

समाकर खून जीवन-जय-विजय सब वे क्रांति के चरिंगान ज्वार थे, समय के अंत तक जीवित रहेगा अहो वे कृति के आकाश थे।
करूं क्या गान उनके शौर्य का मैं तमस वे शक्ति के संसार थे, सदा से पृथक जो निज स्वार्थ से था सकल देवत्व के साकार थे।।

कमल की पंखुड़ी पर ओस जैसे पवित्रता का लिए श्रृंगार थे, विश्वासघात के विरुद्ध यमराज और कर्मफल के नए दंडधार थे।
रुदन और वेदना पर हनक लेकर वे इंकलाब के अनोखे न्यास थे, ह्रदय से पूजती हूँ लेखनी से मनुज थे वे नहीं अवतार थे।।

समर्पण है कलम से प्राणपण से मेरी हर प्रेरणा के ज्वार थे ना देखे विश्व अब उनको घृणा से सकल शीर्णपाद के प्रहार थे।
रहेगा देश गर्वित जिस विभा पर अहो गांडीव की टंकार थे, चिता की धूलकण भी नहीं लौटी लिए अमरत्व के महताब थे।

मैं लिख सकती नहीं इस गल्प को अब, वे मेरी लेखनी के धार थे, रहेगा इस जगत में कान्त उज्जवल नयन में आंसुओं के द्वार थे ।।
हुए जो बलिवेदी पर समर्पित, स्वयं वे द्रोह के विस्तार थे, मनुजता के लिए उन्माद उनका, ब्रह्मर्षि जयकाव्य के सपूत अरबाज थे ।।

जय हिन्द .जय भारत ,वन्दे मातरम्

भव्या चन्द्रा
ईमेल: prabhatchandramalpur@gmail.com
भ्रमणध्वनि-९२२१०२८२०३
यूट्यब- Bhavya Prabhat Chandra


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