बिहार चुनाव में ‘सन ऑफ मल्लाह’ को क्यों इतना भाव दे रही भाजपा?

बिहार चुनाव में 'सन ऑफ मल्लाह' को क्यों इतना भाव दे रही भाजपा?
Share

पटना (एजेंसी)। बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के बारे में माना जा रहा है कि वह अपने दम पर ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सहयोगी जनता दल यूनाइडेट  से ज्यादा सीटें जीत लेगी। गठबंधन में एक ओर जहां जदयू 115 सीटों पर चुनाव लड़ रही है तो वहीं भाजपा 110 सीटों पर मैदान में है। बिहार में भाजपा के इस राजनीतिक बदलाव की वजह को वीआईपी पार्टी के मतदाताओं के साथ आने को माना जा रहा है।

दरभंगा के मुकेश सहनी की अगुआई में दो साल पहले गठित हुए राजनीतिक दल- वीआईपी के साथ भाजपा का गठबंधन है। सहनी खुद राजनीति में साल 2013 से है। मल्लाह जाति की अगुआई करने वाले सहनी, आधिकारिक तौर पर खुद को ‘सन ऑफ मल्लाह’ यानी मल्लाह का बेटा कहते हैं’ वीआईपी उत्तर बिहार में नाविकों और मछुआरों के समूह के मतों में बड़ी हिस्सेदारी का दावा करती है’

हालांकि अभी तक बिहार में निषाद मतदाताओं का कोई अनुमानित आंकड़ा नहीं है’ इस समुदाय की कई और सहजातियां हैं वहीं वीआईपी का दावा है कि समूह का कुल मत में 10 फीसदी हिस्सा है, जबकि अन्य पार्टियां इसे 6-7 फीसदी मानती हैं

अगर हार-जीत का अंतर कम होता है तो इस तरह के वोटों का समूह कुछ सीटों पर चुनाव को प्रभावित कर सकता है निषाद वोटों को मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण, मधुबनी, खगडिय़ा, वैशाली और अन्य उत्तर बिहार जिलों में प्रभावशाली माना जाता है’ इस बेल्ट में निषादों का वोट शेयर 6′ से अधिक बताया जाता है।

जदयू-राजद के टिकट पर चुने गए थे जेपी निषाद

जेपी आंदोलन के दौर में निषाद मतदाता सामाजिक न्याय के वादों वाले दलों के साथ पारंपरिक रूप से प्रतिबद्ध रहे। दिवंगत पूर्व केंद्रीय मंत्री कैप्टन जय नारायण प्रसाद निषाद भाजपा में जाने से पहले कई बार राजद और जद (यू) के टिकट पर मुजफ्फरपुर निर्वाचन क्षेत्र से चुने गए। उनके बेटे अजय निषाद ने 2019 के चुनाव में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की।

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में वीआईपी राजद की अगुआई वाले महागठबंधन में मुजफ्फरपुर, खगडिय़ा और मधुबनी से चुनाव लड़ा था। इस बार एनडीए का हिस्सा बन चुके वीआईपी के नेता सहनी खुद लोजपा के महबूब अली कैसर से खगडिय़ा से 2.5 लाख वोटों के अंतर से हार गए थे। अपने साथ राजद के वोट बैंक के बावजूद, सहनी को केवल 27′ वोट मिले थे। लगभग इतने ही वोट राजद को साल 2014 के लोकसभा चुनाव में मिले थे।

महागठबंधन से एनडीए गठबंधन तक का सफर करते हुए भाजपा की ओर से सहनी को 11 सीटें मिलना उनकी योग्याता माना जा रहा है। 2014 के चुनावों से पहले उन्होंने नरेंद्र मोदी के लिए निषादों की रैली निकाली थी। साल 2015 में भाजपा का ‘स्टार प्रचारक’ बनने से पहले उन्होंने नीतीश के साथ बातचीत की। जब भाजपा चुनाव हार गई, तो सहनी फिर से पलट गए और साल 2019 में राजद से हाथ मिला लिया। इस चुनाव में राजद द्वारा 30 सीटों की मांग खारिज किए जाने के बाद वह फिर से भाजपा के साथ हो लिए।


Share