आभासी देखभाल

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सेहत की दुनिया में तेजी से ऐसे बदलाव हो रहे हैं, जो स्थाई रूप से अपना प्रभाव छोड़ जाएंगे। ऐसे ही बदलावों में एक है, वर्चुअल या आभासी स्वास्थ्य देखभाल। अमेरिका जैसे विकसित देश में जब इस विषय पर जनवरी में डॉक्टरों ने चर्चा की, तो बहुत उत्साह नहीं दिखा, लेकिन मार्च के महीने तक आते-आते आभासी स्वास्थ्य सेवाओं में तेजी साफ तौर पर दिखने लगी। आज के समय में ऐसे अनेक मरीज हैं, जो आभासी रूप से ही अपना इलाज करा रहे हैं। केवल कोरोना के मरीज ही नहीं, बल्कि उनसे कहीं ज्यादा संख्या में अन्य बीमारियों के मरीजों ने भी आभासी सेवा को तरजीह देनी शुरू कर दी है। अमेरिका जैसे विकसित देश में जो सर्वेक्षण हुआ था, उससे पता चलता है कि वर्ष 2018 के बाद से आभासी स्वास्थ्य सेवा धीमी गति से तरक्की कर रही थी, क्योंकि डॉक्टर इसे ज्यादा तरजीह नहीं दे रहे थे। लेकिन अब समय ऐसा है, जब डॉक्टर इस सेवा को हाथों-हाथ लेने लगे हैं। ऐसा केवल अमेरिका में नहीं हुआ है, बल्कि पूरी दुनिया के डॉक्टरों को मरीजों की भलाई के साथ-साथ अपनी भी चिंता सताने लगी है। अब चर्चा यह होने लगी है कि आभासी सेवा का एक अच्छा व्यावसायिक मॉडल विकसित करना पड़ेगा। इसका अर्थ है, मरीज और डॉक्टर के बीच संवाद को आभासी स्तर पर ही सहज, सुविधाजनक और उच्च गुणवत्तापूर्ण बनाना पड़ेगा। इसमें कोई शक नहीं है कि आज चिकित्साकर्मी बड़ी मुसीबत झेल रहे हैं। एक शोध से पता चला है कि पीपीई किट पहनने के बावजूद डॉक्टरों पर खतरा ज्यादा है। कोशिश हो रही है कि कम से कम मरीजों को अस्पताल आने की जरूरत पड़े, ताकि डॉक्टरों को कम से कम खतरा हो। ज्यादा से ज्यादा लोगों को होम क्वारंटीन रखते हुए स्वस्थ करने की चुनौती बढ़ गई है। अमेरिकी सर्वेक्षण से पता चलता है कि डॉक्टरों के बीच परस्पर वर्चुअल बातचीत 2018 में 17 प्रतिशत थी, पर मार्च 2020 में यह 22 प्रतिशत के करीब पहुंच गई। इसी दौरान डॉक्टरों की वर्चुअल विजिट भी 14 प्रतिशत से 19 प्रतिशत हो गई। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह कि 2018 में डॉक्टर वर्चुअल माध्यम से मरीजों से 38 प्रतिशत संवाद करते थे, अब 63 प्रतिशत से ज्यादा करने लगे हैं। 90 प्रतिशत डॉक्टरों ने यह माना है कि सामान्य प्रैक्टिस में ऐसे अनेक जरूरी पहलू नदारद थे, जो वर्चुअल सेवा में साफ महसूस होने लगे हैं। दिलचस्प यह कि सामान्य प्रैक्टिस में डॉक्टर ज्यादातर मरीजों से कोई सहानुभूति नहीं दर्शाते हैं, पर अब 85 प्रतिशत डॉक्टरों को लगता है कि उन्हें सहानुभूति दर्शाने का कौशल विकसित करना होगा, तभी वे बेहतर सेवा दे पाएंगे। अब वर्चुअल प्रैक्टिस में 50 से 70 प्रतिशत तक इजाफा हो चुका है। 84 प्रतिशत डॉक्टरों को लगता है, तकनीक का अबाध उपयोग अब पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है। 82 प्रतिशत डॉक्टरों को लगता है, यह बात पहले नदारद थी। आने वाले समय में ऐसा परिदृश्य निर्मित होगा, जब तमाम अस्पतालों को आभासी स्वास्थ्य सेवा भी मुहैया करानी पड़ेगी। मरीज को केवल अपनी जरूरी जांच के लिए ही अस्पताल आना पड़ेगा। अचरज की बात नहीं कि ज्यादा से ज्यादा मरीज घर बैठे अपनी पूरी जांच चाहेंगे और सेवा में वही डॉक्टर और अस्पताल बेहतर टिकेंगे, जो यह मांग पूरी कर सकेंगे।


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