बौद्धिक संपदा को सहेजने का भरोसा

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केंद्र सरकार ने नई शिक्षा नीति की घोषणा कर दी है। इसमें भाषा और कला-संस्कृति आदि के लिए भी बहुत सी घोषणाएं की गई हैं जिनमें पांडुलिपियों का संरक्षण अहम माना जा रहा है। वैसे इस संबंध में पूर्व में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा जो कदम उठाए गए थे, उसमें क्या प्रगति हुई, उन्हें भी रेखांकित करने की आवश्यकता है। भाषा के संवर्धन के लिए भी इसमें कदम उठाने की बात कही गई है, जिसके लिए पहले से संचालित संबंधित संस्थाओं की भूमिका को भी तय किया जाना चाहिए।
पिछलेदिनों सरकार ने नई शिक्षा नीति की घोषणा की। नई शिक्षा नीति में भाषा और कला को लेकर कई उत्साहवर्धक घोषणाएं की गई हैं। इन घोषणाओं में साफ तौर पर यह कहा गया है कि संस्कृति को मजबूत करने के लिए यह आवश्यक है कि भाषा को मजबूती प्रदान की जाए। शब्दकोश से लेकर अनुवाद तक की महत्ता के बारे में बात की गई है। एक और महत्वपूर्ण बात जो इस नई शिक्षा नीति में कही गई है वह यह कि भारत इसी तरह सभी शास्त्रीय भाषाओं और साहित्य का अध्ययन करने वाले अपने संस्थानों और विश्वविद्यालयों का विस्तार करेगा और उन हजारों पांडुलिपियों को इक_ा करने, संरक्षित करने और अनुवाद करने व उनका अध्ययन करने का मजबूत प्रयास करेगा, जिस पर अभी तक ध्यान नहीं दिया गया है। इसी प्रकार से सभी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में जिसमें शास्त्रीय भाषाओं और साहित्य पढ़ाया जा रहा है, उनका विस्तार किया जाएगा। अभी तक उपेक्षित रहे लाखों अभिलेखों के संग्रह, संरक्षण, अनुवाद और अध्ययन के दृढ़ प्रयास किए जाएंगे। इस शिक्षा नीति में यह एक बेहद महत्वपूर्ण प्रयास होगा।
हमारे प्राचीन ग्रंथों को सहेजने का प्रयास तो होना ही चाहिए। कई बार कई तरह के सर्वेक्षणों में यह बात सामने आ चुकी है कि पूरी दुनिया में भारत के पास सबसे अधिक पांडुलिपियां है, लेकिन साथ ही यह बात भी सामने आती है कि हमारे देश में इन पांडुलिपियों के संरक्षण की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक देश भर में दो करोड़ से अधिक पांडुलिपियां हैं, जिन्हें संरक्षित करने की सख्त आवश्यकता है। इन पांडुलिपियों को सहेजने की बात नई नहीं है और इस शिक्षा नीति में जो कहा गया है इस तरह के प्रयास पहले भी हो चुके हैं। जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने 2002 में पंद्रह अगस्त को लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन की घोषणा की थी। सात फरवरी 2003 को राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन की विधिवत शुरूआत की गई थी। मिशन की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इसकी स्थापना पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय के अधीन की गई थी और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र को नोडल एजेंसी बनाया गया था। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन भविष्य के लिए अतीत का संरक्षण के उद्देश्य से स्थापित किया गया था। इसके शुभारंभ के मौके पर अटल बिहारी वाजपेयी ने भी भाषा को लेकर चिंता जताई थी और कहा था, चूंकि लगभग 70 प्रतिशत पांडुलिपियां संस्कृत में हैं, अत: इस भाषा के शिक्षण व अध्ययन को और प्रवॢतत करने की आवश्यकता होगी तथा अनेक संस्थान जो पहले से ही इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं उन्हें इस मिशन से जोडऩा होगा और अंतत: पांडुलिपियों के निजी अभिरक्षकों को आगे बढ़कर अपनी पांडुलिपियां मिशन को सौंप देने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु एक बड़ा जागरूकता अभियान चलाना होगा।
कुछ इसी तरह की बात नई शिक्षा नीति में भी की गई है। वर्ष 2003 में स्थापित राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन ने पिछले 17 साल में क्या काम किया, ये अब तक ज्ञात नहीं हो पाया है। वर्ष 2004 में एनडीए नहीं रही, लेकिन पांडुलिपि मिशन बन गया था सो चलता रहा, पर कांग्रेस की अगुवाई वाली गठबंधन सरकार में इस पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। मिशन तो किसी काम को पूरा करने के लिए बनाया जाता है और उसकी एक समयावधि होती है। इस मिशन का भी कार्यकाल तय था और अब इसको 2021 तक के लिए बढ़ाया गया है।
पिछले दिनों वाराणसी के दो ऐसे स्थानों पर जाने का अवसर मिला जहां हजारों पांडुलिपियां और प्राचीन ग्रंथ उपलब्ध हैं। इन पांडुलिपियों के उचित रखरखाव और प्राचीन ग्रंथों को पुनर्प्रकाशित करने की आवश्यकता है। काशी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पास हजारों दुर्लभ पांडुलिपियां हैं, जिन पर काम करने की जरूरत है। उनका अनुवाद करके उन्हें शोधाॢथयों या छात्रों के समक्ष लाने की जरूरत है। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन ने इस दिशा में जो प्रयास किया है वह अपर्याप्त है। केवल बनारस में ही नहीं, पूरे देश में जाने कितने पुस्तकालयों में पुरानी पांडुलिपियां पड़ी होंगी, इसका वास्तविक आकलन भी नहीं हो पाया है। सबसे बुरी स्थिति तो उन रजवाड़ों की बताई जा रही है जहां संपत्ति को लेकर विवाद के चलते संपत्तियां अदालतों के आदेश पर सील कर दी गई हैं। इन सील की गई कई संपत्तियों में उन राजघरानों के निजी पुस्तकालय भी हैं। उन पुस्तकालयों में ढेर सारी पांडुलिपियां हैं जो वर्षों से बगैर देखरेख के नष्ट हो गई हैं या हो रही हैं। इसी तरह से देश के अलग अलग हिस्सों के लेखकों के घरों में पांडुलिपियां थीं जो या तो नष्ट हो गईं या नष्ट होने के कगार पर हैं। अगर नई शिक्षा नीति में पांडुलिपियों के प्रकाशन पर ध्यान दिया जाता है तो हम अपनी उन बौद्धिक संपदा को सहेज कर आनेवाली पीढिय़ों के लिए एक बड़ा काम कर पाएंगे।
सवाल यह भी उठता है कि पांडुलिपि मिशन संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत है, लेकिन जब नई शिक्षा नीति में इस पर काम करने की बात की गई है तो क्या यह माना जाए कि अब यह शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत होगा। शिक्षा नीति में तो मोटे तौर पर नीतिगत बातें की गई हैं, उसका क्रियान्वयन कैसे होगा इस पर विस्तृत जानकारी प्रतीक्षित है। अगर सरकार पांडुलिपियों को लेकर गंभीरता से काम करना चाहती है तो उसको पांडुलिपि मिशन को भंग करके राष्ट्रीय पांडुलिपि प्राधिकरण जैसी संस्था का गठन करना होगा। जैसे संस्कृति मंत्रालय ने 2010 में स्मारकों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकारण का गठन किया था। अगर ऐसा हो पाया तो पांडुलिपियों के संरक्षण कार्य को गति भी मिलेगी और स्थायित्व भी।
एक और बात नई शिक्षा नीति में कही गई है कि भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित प्रत्येक भाषा के लिए अकादमी स्थापित की जाएगी जिसमें हर भाषा के श्रेष्ठ विद्वान एवं मूल रूप से वह भाषा बोलनेवाले लोग शामिल रहेंगे ताकि नवीन अवधारणाओं का सरल किंतु सटीक शब्द भंडार तय किया जा सके तथा नियमित रूप से नवीन शब्दकोश जारी किया जा सके। इसी प्रकार व्यापक पैमाने पर बोली जानेवाली अन्य भारतीय भाषाओं की अकादमी केंद्र या और राज्य सरकारों द्वारा स्थापित की जाएंगीं। यह भी कोई नई बात नहीं है। अभी एक साहित्य अकादमी है जो संविधान में उल्लिखित भाषाओं के लिए काम करती है और केंद्रीय हिंदी संस्थान शब्दकोश बनाने का काम करता है। पिछले दिनों केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक नंदकिशोर पांडे ने बहुत श्रमपूर्वक शब्दकोश पर काम करवाया और 45 शब्दकोश का प्रकाशन हो गया और छह पर काम चल रहा है। राज्यों में भी भाषाई अकादमियां हैं, जिनमें से ज्यादातर की हालत खराब है, क्योंकि उनके पास पर्याप्त बजट नहीं है। यह देखना दिलचस्प होगा कि इन अकादमियों का गठन होगा तो साहित्य अकादमी का क्या होगा, केंद्रीय हिंदी संस्थान का क्या होगा, भारतीय भाषा संस्थान मैसूर का क्या होगा, केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान चेन्नई का क्या होगा? क्या सरकार इन संस्थानों के पुनर्गठन की सोच के साथ नई शिक्षा नीति को लेकर आई है। इसमें से कुछ संस्थान तो शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं, लेकिन कई संस्थान संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं। अगर पुनर्गठन की सोच है तो यह एक अच्छी पहल हो सकती है, क्योंकि संस्कृति मंत्रालय की कई ऐसी संस्थाएं हैं, जिनको अगर शिक्षा मंत्रालय के साथ कर दिया जाए तो बेहतर होगा।


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