किले जैसे हैं काशी विश्वनाथ के दरवाजे- एक का वजन 3 टन, ऐसे 4 गेट

The doors of Kashi Vishwanath are like forts - one weighs 3 tons, 4 such gates
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जालौर (कार्यालय संवाददाता)। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की भव्यता के चर्चे आजकल हर जुबान पर हैं। इस भव्यता में सागवान की लकड़ी से बने कई टन वजनी दरवाजे चार चांद लगा रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी चाहते थे कि कॉरिडोर के दरवाजे भी भव्य हो, इसलिए राजे-रजवाड़े की धरती राजस्थान के कारीगरों को इसे बनाने का काम दिया गया। इन दरवाजों को बनाने के लिए जालौर के 35 कारीगरों ने ढाई महीने तक 18-18 घंटे काम किया है। इनकी नक्काशी देखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कारीगरों की खूब तारीफ की।

दरअसल, कॉरिडोर में 6 दरवाजे लगाए गए हैं, इन दरवाजों को बनाने का काम अहमदाबाद की पीसीपी कंपनी को दिया गया था। कंपनी ने यह काम जालौर के कालूराम सुथार को दिया था। उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर ये दरवाजे तैयार किए। इनमें 4 दरवाजे कॉरिडोर में अंदर जाने या बाहर निकलने वाले रास्तों पर हैं। यह चारों दरवाजों का वजन, लंबाई-चौड़ाई एक जैसी है।

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में प्रवेश करने और बाहर निकलने के लिए चार दरवाजे हैं। चारों दरवाजों का वजन 3-3 टन है।

मुख्य दरवाजे का एक पलड़ा 8 फीट चौड़ा है। पूरे दरवाजे में 108 चौपड़ या फूल बनाए गए हैं। चारों बड़े दरवाजे एक जैसे और एक ही वजन के हैं।

मंदिर परिसर में ऐसे दो दरवाजे लगाए हैं। दोनों दरवाजों पर शेर की आकृति बनाई गई है। ये अंदर बने मंदिर में लगाए गए हैं। इनका वजन 2 क्विंटल है।

1300 किमी दूर ले जाने में चार दिन लगे

कालूराम सुथार ने बताया कि दरवाजे तैयार करने का पूरा काम रामसीन गांव में हुआ। करीब 80 दिन में 6 दरवाजे बनाने का काम पूरा हो पाया। इनमें 4 मुख्य दरवाजे हैं। इन दोनों ही दरवाजों का वजन करीब 3-3 टन है। बाकी 2 दरवाजे परिसर में लगाए गए हैं। उन्होंने बताया दरवाजों को तैयार करने में सागवान की लकड़ी का प्रयोग किया गया है। यह सुमेरपुर से मंगवाई गई है। तैयार होने के बाद सभी दरवाजे जालौर से ट्रक के जरिए वाराणसी पहुंचाए गए। करीब 1300 किलोमीटर का सफर तीन से चार दिन में पूरा हुआ।

ऐसे बनाए दरवाजे : 23 फीट ऊंचाई व 16 फीट चौड़ा

कालूराम बताते हैं 8 दिसंबर तक हमारे कारीगरों ने इन दरवाजों को तैयार कर मंदिर प्रशासन के सुपुर्द कर दिया। मुख्य दरवाजा 23 फीट ऊंचा और 16 फीट चौड़ा है। मुख्य दरवाजे का एक पलड़ा 8 फीट चौड़ा है। पूरे दरवाजे में 108 चौपड़ या फूल बनाए गए हैं। हर फूल में एक पीतल की कटोरी लगी हुई है। मुख्य दरवाजे में एक छोटा गेट भी बनाया गया है। इसकी ऊंचाई 6.5 फीट की है।

इन दरवाजों को बनाने में सागवान की लकड़ी और पीतल के फूल का उपयोग किया गया है। यह लकडिय़ां राजस्थान के सुमेरपुर से मंगाई गईं थीं।

कंपनी ने कहा था- किले जैसे दरवाजे चाहिए

कालूराम ने बताया, अहमदाबाद की कंपनी ने हमसे कहा था कि पुराने समय में जिस तरह किलों के दरवाजे होते थे, बिल्कुल वैसे ही दरवाजे चाहिए। कंपनी की इस डिमांड को ध्यान में रखते हुए ही सागवान की लकड़ी और पीतल के फूल का उपयोग कर इन्हें तैयार किया गया है।


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