पिता से संबंध न रखने पर अड़ी बेटी धन पाने की हकदार नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने तलाक के मामले में मां के साथ रह रही बेटी को लेकर दी व्यवस्था

The adamant daughter is not entitled to get money for not having a relationship with the father, the Supreme Court has given arrangements for the daughter living with the mother in the case of divorce
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नई दिल्ली (एजेंसी)।  सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि जो बेटी अपने पिता के साथ कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती, वह पढ़ाई या शादी के लिए किसी भी तरह के धन की हकदार नहीं है।

जस्टिस संजय किशन कौल और एम.एम. सुंदरेश ने कहा कि जहां तक बेटी की पढ़ाई और शादी के खर्च का संबंध है, उसके दृष्टिकोण से ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपीलकर्ता के साथ कोई संबंध नहीं रखना चाहती है। उसकी उम्र लगभग 20 वर्ष है। वह अपना रास्ता चुनने को स्वतंत्र है। उसका अपना रास्ता है लेकिन फिर अपीलकर्ता से शिक्षा के लिए धन की मांग नहीं कर सकती। इस प्रकार, हम मानते हैं कि बेटी किसी भी राशि की हकदार नहीं है।

शीर्ष अदालत का आदेश पति द्वारा दायर तलाक की उस याचिका पर आया और जिसे पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने ठुकरा दिया था। पति को तलाक देते हुए, पीठ ने कहा मौजूदा मामले के तथ्यों में विवाह टूटने के बारे में कोई संदेह नहीं है। इस प्रकार, हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए तलाक का आदेश देते हैं।

पीठ ने कहा कि यह नोट किया गया कि इस शादी में वास्तव में आपसी कटुता के अलावा कुछ भी नहीं बचा है। दोनों पक्षों के लिए यह संभव नहीं है कि किसी समझौते पर पहुंचने के लिए वे मेज पर बैठें या फोन पर बात भी करें। पीठ ने कहा कि पत्नी के पास है व्यवहारिक रूप से कोई पैसा और साधन नहीं है।

वह अपने भाई के साथ रहती है जो उसका और उसकी बेटी की शिक्षा का खर्च उठा रहा है। मां को स्थायी गुजारा भत्ता के रूप में भुगतान की जाने वाली राशि का निर्धारण करते हुए, पीठ ने कहा कि हम प्रतिवादी के स्थायी गुजारा भत्ता को दुरूस्त करना उचित समझते हैं। वर्तमान में अंतरिम रखरखाव के रूप में 8,000 रूपये प्रति माह का भुगतान किया जा रहा है। जिसे एकमुश्त अंतिम भुगतान के तौर पर 10 लाख रूपये किया जा रहा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर मां, बेटी का साथ निभाना चाहती है, तो धन उपलब्ध है। बेटी जन्म से ही अपनी मां के साथ रह रही है। दांपत्य अधिकारों की बहाली के लिए याचिका खारिज होने के बाद पति ने जिला जज के समक्ष एक याचिका दायर कर विवाह भंग करने की मांग की थी। जिला जज ने याचिका को स्वीकार कर ली जिसे पत्नी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट द्वारा निचली अदालत के आदेश को रद्द करने के बाद पति ने शीर्ष अदालत का रूख किया। सुप्रीम कोर्ट के मध्यस्थता केंद्र ने सुलह  का प्रयास किया, लेकिन यह सफल नहीं हुआ।


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