देशद्रोह पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा फैसला – 1870 में बने कानून के तहत नए केस दर्ज करने पर रोक

मोरेटोरियम पीरियड पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा
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नई दिल्ली (एजेंसी)। देश में अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे देशद्रोह कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त फैसला दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि जब तक आईपीसी की धारा 124-ए की री-एग्जामिन प्रोसेस पूरी नहीं हो जाती, तब तक इसके तहत कोई मामला दर्ज नहीं होगा। कोर्ट ने पहले से दर्ज मामलों में भी कार्रवाई पर रोक लगा दी है। वहीं, इस धारा में जेल में बंद आरोपी भी जमानत के लिए अपील कर सकते हैं।

केंद्र सरकार ने बुधवार को 1870 में बने यानी 152 साल पुराने राजद्रोह कानून (आईपीसी की धारा 124-ए) पर सुप्रीम कोर्ट में जवाब दायर किया। इसके बाद कोर्ट ने केंद्र को इस कानून के प्रावधानों पर फिर से विचार करने की अनुमति दे दी।

सुप्रीम कोर्ट ने देशद्रोह कानून को लेकर कही ये 5 बड़ी बातें

  • शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में देशद्रोह के सभी लंबित मामलों पर रोक लगा दी है। साथ ही पुलिस और प्रशासन को सलाह दी है कि केंद्र की समीक्षा पूरी होने तक कानून की इस धारा का इस्तेमाल नहीं करें। मुख्य न्यायाधीश एनवी रमणा ने कहा, अगर नया मामला दर्ज किया जाता है, तो संबंधित पार्टियां इसे जल्दी खत्म करने के लिए कोर्ट का रूख कर सकती हैं।
  • सीजेआई ने कहा कि कानून का दुरूपयोग रोकने के लिए केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के लिए निर्देश जारी करने की आजादी है। उन्होंने कहा, दोबारा जांच पूरी होने तक कानून के इस प्रावधान का दोबारा इस्तेमाल नहीं करना ठीक होगा। हम उम्मीद करते हैं कि जांच पूरी होने तक केंद्र और राज्य 124ए के तहत कोई भी एफआईआर दर्ज करने या कार्रवाई शुरू करने से बचेंगे।
  • सीजेआई ने कहा, भारत संघ कानून पर दोबारा विचार करेगा। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कानून का दुरूपयोग किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि एटॉर्नी जनरल ने भी हनुमान चालीसा मामले में देशद्रोह के आरोप का जिक्र किया। साथ ही जांच पूरी होने तके दोबारा इसका इस्तेमाल नहीं करने की बात की।
  • केंद्र ने प्रस्ताव दिया है कि भविष्य में धारा 124ए के तहत एफआईआर केवल पुलिस अधीक्षक या इससे ऊपर के अधिकारियों की जांच के बाद दर्ज की जा सकेंगी। सरकार ने कहा कि लंबित मामलों में कोर्ट जमानत पर जल्दी विचार करने के निर्देश दे सकता है। याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट में पेश हुए वकील कपिल सिब्बल ने कहा, देशभर में देशद्रोह के 800 से ज्यादा मामले दर्ज हैं। 13 हजार लोग जेल में हैं।
  • देशद्रोह कानून के पक्ष में खड़ी सरकार लगातार इसे चुनौती देने वाली याचिका खारिज करने की मांग कर रही है। सरकार ने कोर्ट में कहा कि उसने कानून की समीक्षा करने का फैसला किया है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देशों के बाद यह फैसला किया है।

एसजी ने सरकार की तरफ से यह भी कहा

केंद्र ने कहा संज्ञेय अपराध को दर्ज होने से नहीं रोका जा सकता है। कानून के प्रभाव पर रोक लगाना सही नहीं हो सकता, इसलिए जांच के लिए एक जिम्मेदार अधिकारी होना चाहिए। मामला तभी दर्ज हो, जब वह कानून के तहत तय मानकों के अनुरूप हो। एसजी तुषार मेहता ने कहा कि देशद्रोह के लंबित मामलों की गंभीरता का पता नहीं है। इनमें शायद आतंकी या मनी लॉन्ड्रिंग का एंगल है। वे कोर्ट में विचाराधीन हैं, और हमें उनके फैसलों का इंतजार करना चाहिए। केंद्र ने यह दलील भी दी कि कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा बरकरार रखे गए देशद्रोह के प्रावधानों पर रोक लगाने के लिए आदेश देना सही तरीका नहीं हो सकता है।

पांच पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में 10 याचिकाएं दाखिल कीं

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा समेत पांच पक्षों की तरफ से देशद्रोह कानून को चुनौती देने वाली याचिका दायर की गई थी। मामले में याचिकाकर्ताओं का कहना है कि आज के समय में इस कानून की जरूरत नहीं है। इस मामले की सुनवाई सीजेआई एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच कर रही है। इस बेंच में जस्टिस सूर्यकांत त्रिपाठी और जस्टिस हिमा कोहली भी शामिल हैं।

पहले केंद्र ने कहा था- कानून खत्म न किया जाए

पिछले गुरूवार को सुप्रीम कोर्ट ने देशद्रोह कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की थी। इस दौरान केंद्र की ओर से यह दलील दी गई थी कि इस कानून को खत्म न किया जाए, बल्कि इसके लिए नए दिशा-निर्देश बनाए जाएं।


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