पहली बार 16 हजार टन कोयला लेकर दौड़ी सुपर शेषनाग

पहली बार 16 हजार टन कोयला लेकर दौड़ी सुपर शेषनाग
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कोरबा (एजेंसी)। चार मालगाडिय़ों में 16 हजार टन (700 ट्रक के बराबर) कोयला लोड कर सुपर शेषनाग ने कोरबा से भिलाई के बीच 280 किलोमीटर की दूरी सात घंटे में तय की है। करीब ढाई किलोमीटर लंबी इस मालगाड़ी में डिस्ट्रीब्यूटेड पावर वायरलेस कंट्रोल सिस्टम (डीपीडब्ल्यूसीएस) का उपयोग किया गया। इसमें लीङ्क्षडग पावर (अगला इंजन) जीपीएस के माध्यम से पीछे लगे तीनों इंजनों से जुड़ा रहा।

सुपर शेषनाग के रूप में पहली बार चार रैक की लोडेड मालगाड़ी चलाई गई। इसमें दो की लोङ्क्षडग दीपका, एक जूनाडीह व एक कुसमुंडा से की गई। कोयले से भरी चार रैक कोरबा स्टेशन के यार्ड में जोड़ी गई। लोड रैक में भार अचानक बढ़ जाता है। इसमें वैगन के बीच कपलिंग के टूटने का डर बना रहता है। इसे देखते हुए मालगाडिय़ों में डीपीडब्ल्यूसीएस का प्रयोग किया गया। इस सिस्टम में लीङ्क्षडग पावर से अन्य इंजनों को जोडऩे में आसानी होती है। साभी लोड रैक सुपर शेषनाग बनाकर अलग-अलग क्षेत्र के बिजली संयंत्रों को भेजी गई हैं। इनमें से एक नागपुर डिवीजन अंतर्गत जबलपुर के पास मोहदा एनटीपीसी, दूसरा गुजरात के संयंत्र टीपीएचएस व ईएसडब्ल्यूएस और एक रैक बीआरडी धानुरोड में भेजी गई। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे कोरबा रेलखंड के क्षेत्रीय रेल प्रबंधक मनीष अग्रवाल ने बताया कि सुपर शेषनाग को मंगलवार-बुधवार की रात 12. 25 पर जोडऩे की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके बाद रात 2.25 बजे रवाना हुई मालगाड़ी सुबह 9.15 पर भिलाई पहुंच गई। इस तरह सात घंटे से भी कम समय में कुल 280 किलोमीटर की दूरी तय की गई।

कोयले से भरी मालगाड़ी को कहा गया है सुपर शेषनाग : दो खाली रैक को लांगहाल मालगाड़ी या पायथन कहा गया है। तीन खाली मालगाडिय़ों को जोड़कर एनाकोंडा कहा गया। इसी तरह तीन लोड मालगाड़ी को बाहुबली कहते हैं। चार रैक जोड़कर शेषनाग मालगाड़ी बनती है। कोयले से भरी चार मालगाडिय़ों को सुपर शेषनाग का नाम दिया गया है।


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