मुंह से बदबू आना ड्राइवर के शराब पीने का सबूत नहीं

मुंह से बदबू आना ड्राइवर के शराब पीने का सबूत नहीं
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नई दिल्ली (एजेंसी)। मुंह से सिर्फ बदबू आने पर यह नहीं माना जा सकता कि ड्राइवर नशे में था और उसने शराब पी रखी थी। दुर्घटना के समय ड्राइवर ने शराब पी रखी थी कि नहीं यह सिर्फ मेडिकल जांच के सुबूतों से ही साबित हो सकता है। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने सिर्फ मुंह से शराब की बदबू आने के आधार पर ड्राइवर को नशे में मानकर बीमा दावा खारिज करने का दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का फैसला रद्द कर दिया है। एनसीडीआरसी ने दुघर्टना में हुए नुकसान की भरपाई की मांग स्वीकार करते हुए बीमा कंपनी को छह सप्ताह में नुकसान का आकलन करने और उसके बाद छह सप्ताह में नुकसान की भरपाई करने का आदेश दिया है। साथ ही शिकायत की तारीख से नौ फीसद ब्याज भी देने का आदेश दिया है।

यह फैसला एनसीडीआरसी ने दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के आदेश के खिलाफ दाखिल पर्ल ब्रेवरेज लिमिटेड की अपील स्वीकार करते हुए सुनाया है। मामला वर्ष 2007 का है। याचिकाकर्ता ने अपने वाहन का बीमा इफ्को टोकियो जनरल इंश्योरेंस कंपनी से करा रखा था। 22 दिसंबर, 2007 को वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गया। वाहन मालिक ने नुकसान की भरपाई के लिए दावा दाखिल किया, लेकिन बीमा कंपनी ने सिर्फ इस आधार पर दावा खारिज कर दिया कि दुर्घटना के समय वाहन चालक नशे में था। दावा खारिज होने पर वाहन मालिक ने राज्य उपभोक्ता आयोग में शिकायत की और नुकसान की भरपाई मांगी। राज्य आयोग ने ड्राइवर के नशे में होने के आधार पर शिकायत खारिज कर दी। रिकार्ड पर सिर्फ पुलिसकर्मी का बयान है जिसमें कहा गया है कि ड्राइवर के मुंह से शराब की बदबू आ रही थी। ड्राइवर के नशे में होने की जांच के लिए दुर्घटना के बाद कोई मेडिकल टेस्ट नहीं हुआ जिससे पता चलता कि उसके रक्त में कितना अल्कोहल पाया गया।

नहीं हुई थी जांच

एनसीडीआरसी ने कहा कि मोटर वाहन कानून की धारा 185 के अनुसार व्यक्ति दंड का भागी होगा अगर वाहन चलाते समय उसके शरीर में 100 एमएल रक्त में 30 एमजी से ज्यादा अल्कोहल पाया जाता है। इसकी जांच ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट से की जाती है और इस मामले में ऐसी कोई जांच नहीं हुई थी। भारत में 30 एमजी, यूएसए में 100 एमजी और ऑस्ट्रेलिया में 40 एमजी से कम की सीमा है।


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