हिमालय की सर्द रातों में यूं गर्मी बढ़ा रहे राफेल – चीन-पाकिस्तान के लिए टेंशन

हिमालय की सर्द रातों में यूं गर्मी बढ़ा रहे राफेल - चीन-पाकिस्तान के लिए टेंशन
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नई दिल्ली (एजेंसी)। भारतीय राफेल लड़ाकू विमानों ने जंग की तैयारी शुरू कर दी है। फिलहाल वे हिमाचल प्रदेश की बर्फीली वादियों में रात के वक्त अभ्यास कर रहे हैं। पहाड़ों के बीच कठिन रास्तों में उनका यह अभ्यास पूर्वी लद्दाख में चीन और कश्मीर में पाकिस्तान से लड़ाई के हालात में बेहद काम आएगा। यहां हिमालय की चोटियों की टेरेन वहां से काफी हद तक मिलती-जुलती है। एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर लद्दाख सेक्टर में चीन से लगी सीमा पर हालात बिगड़ते हैं तो राफेल अपनी मेटोर और एससीएएलपी मिसाइलों के साथ हमला करने को एकदम तैयार रहेंगे। ये राफेल भारतीय वायुसेना की गोल्डन एरोज स्क्वाड्रन को मिले हैं।

अपनी सिग्नेचर फ्रीक्वेंसी बदल सकते हैं ये राफेल

हिमाचल प्रदेश में उड़ान भरते हुए राफेल विमान फिलहाल एलएसी से दूरी बनाकर चल रहे हैं। ऐसा इसलिए ताकि अक्साई चिन में तैनात पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के रडार इनके फ्रीक्वेंसी सिग्नेचर्स की पहचान न कर लें। सबसे खराब स्थिति में चीन इन सिग्नेचर्स का यूज कर जेट्स को जैम कर सकता है। हालांकि मिलिट्री एक्सपर्ट्स के मुताबिक, लद्दाख में भी ट्रेनिंग के लिए राफेल यूज किया जा सकता है क्योंकि इसमें ऐसे सिग्नल प्रोसेसर्स लगे हैं कि जो जरूरत पडऩे पर सिग्नल फ्रीक्वेंसी बदल सकते हैं।

घातक हथियारों से लैस हैं ये राफेल

भारत में जो राफेल आए हैं, उनके साथ मेटोर बियांड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल, एमआईसीए मल्टी मिशन एयर-टू-एयर मिसाइल और एससीएएलपी डीप-स्ट्राइक क्रूज मिसाइल्स लगी हैं। इससे भारतीय वायुसेना के जांबाजों को हवा और जमीन पर टारगेट्स को उड़ाने की जबर्दस्त क्षमता हासिल हो चुकी है। मेटोर मिसाइलें नो-एस्केप जोन के साथ आती हैं यानी इनसे बचा नहीं जा सकता। यह फिलहाल मौजूद मीडियम रेंज की एयर-टू-एयर मिसाइलों से तीन गुना ज्यादा ताकतवर हैं। इस मिसाइल सिस्टम के साथ एक खास रॉकेट मोटर लगा है जो इसे 120 किलोमीटर की रेंज देता है।

चीन के साथ बातचीत जारी लेकिन तनाव बरकरार

भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में सीमा पर गतिरोध दूर करने के लिए कूटनीतिक और सैन्य बातचीत चल रही है। फिलहाल दोनों सेनाओं का फोकस न सिर्फ एलएसी के वेस्टर्न सेक्टर, बल्कि बाकी हिस्सों पर भी है। भारत ने साफ कर दिया है कि चीन को देपसांग और पैंगोंग त्सो से पीछे जाना ही होगा, उसके बिना शांति बहाल नहीं हो सकेगी। पिछले हफ्ते सेना प्रमुख ने सेंट्रल और ईस्टर्न आर्मी कमांडर्स से हाईएस्ट अलर्ट पर रहने को कहा था। नेवी भी अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर में लगातार नजर बनाए हुए हैं।


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