PM मोदी ने यूएन में सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी की

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न्यूयॉर्क (एजेंसी)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को तीसरी बार संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) की 75वीं बैठक को संबोधित किया। उन्होंने किसी भी देश का नाम लिए बिना कहा, भारत दुनिया का सबसे बड़े लोकतंत्र है। विश्व की 18′ से ज्यादा जनसंख्या, सैकड़ों भाषाओं-बोलियों, अनेकों पंथ, अनेकों विचारधारा वाली है। जो देश वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व सैकड़ों वर्षों तक करता रहा और सैकड़ों साल तक गुलाम रहा। जब हम मजबूत थे तो सताया नहीं, जब मजबूर थे तो बोझ नहीं बने। उन्होंने अपनी 22 मिनट की स्पीच में संयुक्त राष्ट्र संघ की अहमियत पर सवाल उठाए। कोविड-19 का जिक्र किया। कहा कि भारत दुनिया को इस महामारी से उबारेगा और वैक्सीन का सबसे बड़ा उत्पादक देश बनेगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता का भी जिक्र किया। कहा कि भारत कब तक इंतजार करता रहेगा।

1. सुरक्षा परिषद की प्रासंगिकता

मोदी ने कहा- 1945 की दुनिया आज से एकदम अलग थी। साधन, संसाधन सब अलग थे। ऐसे में विश्व कल्याण की भावना के साथ जिस संस्था का गठन हुआ, वो भी उस समय के हिसाब से ही थी। आज हम बिल्कुल अलग दौर में हैं। 21वीं सदी में हमारे वर्तमान की, भविष्य की आवश्यकताएं और चुनौतियां अलग हैं। आज पूरे विश्व समुदाय के सामने एक बहुत बड़ा सवाल है कि जिस संस्था का गठन तबकी परिस्थतियों में हुआ था, वह आज भी प्रासंगिक है। सब बदल जाए और हम ना बदलें तो बदलाव लाने की ताकत भी कमजोर हो जाती है।

2. यूएन के प्रयासों पर सवाल

75 साल में संयुक्त राष्ट्र की उपलब्धियों को मूल्यांकन करें, तो तमाम उपलब्धियां हैं। लेकिन, कई उदाहरण हैं, जो गंभीर आत्ममंथन की आवश्यकता खड़ी करते हैं। कहने को तो तृतीय विश्वयुद्ध नहीं हुआ। पर अनेकों युद्ध हुए, गृह युद्ध हुए, आतंकी हमलों ने दुनिया को थर्रा कर रख दिया, खून की नदियां बहती रहीं। इन हमलों में जो मारे गए, वो हमारे आपकी तरह इंसान ही थे। वो लाखों मासूम बच्चे, जिन्हें दुनिया पर छा जाना था, वो दुनिया छोड़कर चले गए। कितने ही लोगों को अपने जीवन भर की पूंजी गंवानी पड़ी, घर छोडऩा पड़ा। आज ऐसे में संयुक्त राष्ट्र के प्रयास क्या पर्याप्त थे। कोरोना से दुनिया 8-9 महीने से संघर्ष कर रहा है। इस महामारी से निबटने के लिए संयुक्त राष्ट्र का प्रभावशाली नेतृत्व कहां था।

3. यूएन की रिफॉर्म की प्रॉसेस और भारत की भूमिका

संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था, प्रक्रिया में बदलाव आज समय की मांग है। भारत के लोग संयुक्त राष्ट्र के रिफॉर्म को लेकर चल रही प्रॉसेस के पूरा होने का लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं। आखिर कब तक भारत को संयुक्त राष्ट्र के डिसीजन मेकिंग स्ट्रक्चर से अलग रखा जाएगा। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, विश्व की 18 फीसदी से ज्यादा जनसंख्या, सैकड़ों भाषाओं-बोलियों, अनेकों पंथ, अनेकों विचारधारा वाला देश। जो देश वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व सैकड़ों वर्षों तक करता रहा और सैकड़ों साल तक गुलाम रहा। जब हम मजबूत थे तो सताया नहीं, जब मजबूर थे तो बोझ नहीं बने।

4. भारत संयुक्त राष्ट्र में अपनी भूमिका को देख रहा है

जिन आदर्शों के साथ संयुक्त राष्ट्र का गठन हुआ, उससे भारत की दार्शनिक सोच बहुत मिलती है। इसी हॉल में ये शब्द अनेकों बार गूंजा है कि वसुधैव कुटुंबकम। हम पूरे विश्व को परिवार मानते हैं। ये हमारी संस्कृति, संस्कार और सोच का हिस्सा है। भारत ने हमेशा विश्वकल्याण को ही प्राथमिकता दी है। हमने शांति की स्थापना के लिए 50 पीस कीपिंग मिशन में अपने जांबाज भेजे। हमने शांति की स्थापना में अपने सबसे ज्यादा वीर सैनिकों को खोया है। आज हर भारतवासी संयुक्त राष्ट्र में अपने योगदान, भूमिका को देख रहा है।

5. भारत अनुभवों को साझा करने में पीछे नहीं रहता

भारत ने हमेशा पूरी मानव जाति के हित के बारे में सोचा है ना कि अपने निहित स्वार्थों को बारे में। भारत की नीतियां हमेशा इसी दर्शन से प्रेरित रही हैं। नेबरहुड फर्स्ट से लेकर एक्ट ईस्ट पॉलिसी तक, इंडो-पैसेफिक के प्रति हमारे विचार में इस दर्शन की झलक दिखाई देती है। भारत जब किसी से दोस्ती का हाथ बढ़ाता है तो वो किसी तीसरे के खिलाफ नहीं होती। भारत जब विकास की साझेदारी मजबूत करता है तो उसके पीछे किसी साथी देश को मजबूर करने की सोच नहीं होती है। हम अपनी विकास यात्रा से मिले अनुभव साझा करने में कभी पीछे नहीं रहते हैं। (शेष पेज 8 पर)


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