एबीपी सी-वोटर सर्वे & बसपा पर लगातार घट रहा लोगों का भरोसा, भाजपा की बढ़त बरकरार, सपा का ग्राफ स्थिर

People's trust on ABP C-Voter Survey & BSP is continuously decreasing
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लखनऊ (एजेंसी)। यूपी चुनाव को लेकर एबीपी सी-वोटर सर्वे में भारतीय जनता पार्टी को एक बार फिर बढ़त मिलती दिख रही है। पिछले 10 दिनों के लोगों के मूड के आधार पर सर्वे रिपोर्ट आई है। इसमें भाजपा अपने पिछले आंकड़े से बढ़ती दिख रही है। वहीं, समाजवादी पार्टी लोगों का समर्थन बढ़ाने में कामयाब होती नहीं दिख रही है। वहीं, यूपी चुनाव में एक बार फिर बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर होता नहीं दिख रहा है।

एबीपी सी-वोटर के 23 दिसंबर तक के सर्वे में 48 फीसदी लोगों ने माना है कि भारतीय जनता पार्टी फिर से सरकार बना सकती है। वहीं, 31 फीसदी लोगों ने माना है कि समाजवादी पार्टी जीतेगी। वहीं, 7 फीसदी लोगों को लगता है कि मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी एक बार फिर यूपी की सत्ता में वापसी कर सकती है। वहीं, 6 फीसदी लोगों ने प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने का दावा किया। 2 फीसदी लोगों को लगता है कि प्रदेश में विधानसभा त्रिशंकु होने वाली है। वहीं, 3 फीसदी लोगों ने किसी प्रकार की जानकारी नहीं होने की बात कही।

7 दिनों में बढ़ा भाजपा का ग्राफ

एबीपी सी-वोटर ने 16 दिसंबर को जो सर्वे किया था उसमें भाजपा को जीतता देखने वालों की संख्या 47 फीसदी बताई थी। वहीं, एक सप्ताह बाद यानी 23 दिसंबर को यह आंकड़ा 48 फीसदी पर पहुंचा है। इससे साफ है कि पिछले साल दिनों में भाजपा पर एक फीसदी लोगों का विश्वास बढ़ा है। वहीं, 16 दिसंबर से 23 दिसंबर तक के सर्वे में समाजवादी पार्टी 31 फीसदी लोगों का समर्थन के आंकड़े को ही बरकरार रख पाने में कामयाब रही है। अखिलेश यादव की कोशिशों के बाद भी इसमें बढ़ोत्तरी नहीं दिख रही है।

बसपा-कांग्रेस को हो रहा है नुकसान

सर्वे में बसपा को नुकसान होता दिख रहा है। 16 दिसंबर को 8 फीसदी लोगों ने मायावती के दोबारा सीएम बनने का भरोसा दिलाया था। 23 दिसंबर के सर्वे में एक फीसदी लोगों का भरोसा पार्टी ने खोया है। वहीं, कांग्रेस की ओर से प्रियंका गांधी और राहुल गांधी के चुनावी मैदान में उतरने के बाद भी फायदा होता नहीं दिख रहा है। पार्टी 6 फीसदी लोगों के समर्थन के आंकड़े से आगे बढ़ती नहीं दिख रही है। हालांकि, त्रिशंकु सरकार बनने का दावा करने वाले लोगों की संख्या में भी एक सप्ताह में एक कमी आई है।

चुनावी मैदान से घटने लगा किसानों का मुद्दा : यूपी के चुनावी मैदान में किसानों का मुद्दा गरमाने का अंदेशा केंद्र सरकार को भी था। इस कारण तीन विवादित कृषि कानूनों को वापस ले लिया गया।

इसके बाद भी किसानों का मुद्दा लगातार बना हुआ था। 14 दिसंबर, 16 दिसंबर और 20 दिसंबर के सर्वे में किसान आंदोलन का मुद्दा बनने की बात 25 फीसदी लोग कर रहे थे। प्र.म. मोदी के कृषि कानून वापस लेने और वाराणसी से किसान नेता चौधरी चरण सिंह को याद किए जाने के बाद से बनी स्थिति के बाद आए सर्वे रिपोर्ट में 24 फीसदी लोग मानते हैं कि किसानों का मुद्दा रहेगा। यानी, इसमें एक फीसदी की कमी आई है।

धु्रवीकरण हो सकता है चुनाव का बड़ा मुद्दा

चुनाव में वोटों के धु्रवीकरण की कोशिश हर तरफ से शुरू हो गई है। राहुल गांधी के हिंदू और हिंदुत्व से लेकर असदुद्दीन ओवैसी के बिगड़े बोल तक और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काशी में गंगा स्नान तक को चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। इससे वर्ग विशेष को अपने पाले में लाने की कोशिश हो रही है। 14 दिसंबर को 16 फीसदी लोग धु्रवीकरण को मुद्दा मान रहे थे। वहीं, 23 दिसंबर को यह संख्या बढ़कर 17 फीसदी हो गई। 16 फीसदी लोगों को लगता है कि चुनाव में कोरोना भी एक मुद्दा हो सकता है।

कानून व्यवस्था को भी मुद्दा बनाने की कोशिश लगातार हो रही है। पिछले 10 दिनों में इसमें 2 फीसदी का इजाफा हुआ है। अब 16 फीसदी लोगों को कानून व्यवस्था एक मुद्दा लगने लगा है। वहीं, सरकार के काम को मुद्दा मानने वालों में कमी आई है। 10 दिन पहले तक 11 फीसदी लोगों को सरकार का काम मुद्दा बनता दिख रहा था। अब 10 फीसदी लोग ऐसा सोचते हैं। प्रधानमंत्री की छवि को लगातार 7 फीसदी लोग मुद्दा मान रहे हैं। अन्य मुद्दा 10 फीसदी लोग मान रहे हैं।


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