एनडीए की राष्ट्रपति उम्मीदवार का राजस्थान कनेक्शन, बेटे की मौत के बाद डिप्रेशन में आईं, ब्रह्मकुमारी संस्था से राजयोग सीखा

एनडीए की राष्ट्रपति उम्मीदवार का राजस्थान कनेक्शन, बेटे की मौत के बाद डिप्रेशन में आईं, ब्रह्मकुमारी संस्था से राजयोग सीखा
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आबूरोड (कार्यालय संवाददाता)।  देश में होने जा रहे राष्ट्रपति चुनाव को लेकर एनडीए ने द्रोपदी मुर्मू के नाम की घोषणा कर दी है। इस समय पूरे देश में उनके नाम की चर्चा हो रही है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनका राजस्थान से भी गहरा नाता है। वे एक दो बार नहीं बल्कि कई बार राजस्थान के माउंट आबू और आबूरोड आ चुकी हैं। मुर्मू की आध्यात्म में गहरी रूचि है और इसीलिए वे माउंटआबू के ब्रह्मकुमारी संस्थान से जुड़ी हुई हैं। बेटे की मौत के बाद इस संस्थान से उनका रिश्ता गहरा होता गया। डिप्रेशन दूर करने के लिए यहां से राजयोग सीखा था।

इसके साथ ही वे संस्थान के कई कार्यक्रमों में शामिल हो चुकी है। दो बार तो झारखंड की राज्यपाल रहते हुए आई। 31 जनवरी 2016 को एक कार्यक्रम में वे यहां आईं थीं। इसके बाद वे 8 फरवरी 2020 को मूल्य शिक्षा महोत्सव कार्यक्रम में भाग लेने के लिए संस्थान पहुंची थीं। राष्ट्रपति पद के लिए उनके नाम की घोषणा होने के बाद यहां संस्थान के सदस्यों में खुशी की लहर है।

2009 में डिप्रेशन में आने के बाद संस्थान से जुड़ीं

मुर्मू उड़ीसा में संथाल आदिवासी समाज से आती हैं। उनका बचपन और फिर आगे का जीवन संघर्ष से भरा रहा। 2000 में उन्हें विधायक का टिकट मिला और वे जीत गई और इसके बाद वे मंत्री बनीं। 2009 में वे चुनाव हार गई और अपने गांव लौट आई। इसी बीच एक हादसे में उनके बेटे की मौत हो गई। जिसके बाद वे डिप्रेशन में चली गईं। संस्थान के कार्यकारी सचिव बी.के. मृत्युंजय के अनुसार इसके बाद मुर्मू 2009 में संस्थान से जुड़ी और राजयोग सीखा। इसके बाद वे लगातार संस्थान से जुड़ी रही और समय-समय पर यहां आती रही। किसी तरह वे सदमे से बाहर आई, लेकिन 2013 में उनके दूसरे बेटे की भी दुर्घटना में मौत हो गई। 2014 में उन्होंने पति को भी खो दिया। इसके बाद वे आध्यात्म से काफी गहराई से जुड़ गई।

राष्ट्रपति बनने से पहले प्रतिभा पाटिल भी गई थी संस्थान

देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं प्रतिभा पाटिल भी राष्ट्रपति बनने से पहले ब्रह्मकुमारीज संस्थान जा चुकी हैं। वे उस समय राजस्थान की राज्यपाल थीं। जब यूपीए की ओर से उनके नाम की घोषणा हुई थी तो वे माउंट आबू में ही थीं। बतौर राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और रामनाथ कोविंद भी यहां आ चुके हैं।


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