लखीमपुर-खीरी डीएम आवास निकला राजमहल

लखीमपुर-खीरी डीएम आवास निकला राजमहल
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लखीमपुर-खीरी (एजेंसी)। लखीमपुर-खीरी डीएम आवास निकला राजमहल – उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में एक दिलचस्प मामला सामने आया है। एक आरटीआई से परिवार को करोड़ों रूपये की संपत्ति वापस मिल गई। दरअसल जिले का डीएम आवास ओयल रियासत का निकला। अब राजपरिवार ने डीएम आवास पर दावा किया है।

कहानी 1928 से शुरू होती है। तब ओयल रियासत के राजा युवराज दत्त सिंह हुआ करते थे। उन्होंने अपना महल जिले के डीएम को किराए पर दिया था। उसके बाद से इस महल का उन्हें किराया मिलने लगा। 1958 में इस किरायेनामे का आगे 30 साल का नवीनीकरण भी किया गया। यह नवीनीकरण राजा युवराज दत्त ने किया।

महल का खसरा संख्या था गायब

राजा युवराज दत्त का निधन 1984 में हो गया। 30 साल बाद 1988 में जब फिर इस बंगले के किरायेनामे के नवीनीकरण की बात आई तो राजपरिवार हैरान हो गया। महल के दस्तावेज गायब थे। पता चला कि 1959 में जो डीड संपादित की गई थी और जो खसरा नंबर चढ़ा है, वह महल का नहीं है।

मूल दस्तावेज नहीं मिले

डीड बढ़ाने और सही खसरा संख्या पता करने के लिए प्रशासन ने परिवार से मूल दस्तावेज मांगे। राजपरिवार के पास महल के मूल दस्तावेज नहीं मिले। प्रशासन ने राज परिवार को किराया देना बंद कर दिया और किरायानाम भी खारिज हो गया। परिवार ने अपने स्तर से मूल दस्तावेज ढूंढना और प्रशासन से मांगना जारी रखा, लेकिन कुछ नहीं हुआ।

2019 में डाली गई आरटीआई

बीते दिनों राजा के पौत्र प्रद्युम्न नारायण सिंह की मुलाकात आरटीआई ऐक्टिविस्ट सिद्धार्थ नारायण सिंह से हुई। सिद्धार्थ ने उन्हें आरटीआई के जरिए दस्तावेज मांगने की बात कही। प्रद्युम्न ने सिद्धार्थ को यह जिम्मा दिया। सिद्धार्थ ने 2019 में चार आरटीआई लखीमपुर डीएम, कमिश्नर, वित्त विभाग और राजस्व परिषद में डालीं।

सीतापुर से दस्तावेज मांगने को कहा

27 मार्च 2020 को सिद्धार्थ को जवाब मिला कि दस्तावेज सीतापुर में हो सकते हैं क्योंकि आजादी के पहले लखीमपुर के अभिलेख सीतापुर में रखे जाते थे। इसके बाद उन्होंने उप निबंधक कार्यालय से आरटीआई लगाकर सूचना मांगी। 21 फरवरी 2021 को खाता संख्या 5 और खसरा संख्या 359 के दस्तावेज उन्हें मिल गए। यह दस्तावेज महल के थे।

101 रूपये मिलता था किराया

सिद्धार्थ ने कहा कि मात्र 10 रू के खर्चे में उन्हें दस्तावेज मिल गए, जबकि राज परिवार कई वर्षों से परेशान था। उन्होंने कहा कि 1928 में राज परिवार को 101 रूपये किराया मिलता था। किरायेनामे में यह भी शर्त थी कि 101 रूपये की जगह अगर राज परिवार डीएम के वेतन का दस फीसदी किराये के रूप में लेना चाहे तो वह ले सकते हैं।


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