क्रांति बल्लभ काकोरी वीर- भव्या प्रभात चंद्रा

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हिन्दुस्ताँ की शान हैं अशफाक और बिस्मिल, दो जिस्म मगर एक जान हैं अशफाक और बिस्मिल I

उस मुल्क को गुलाम कोई बना नहीं सकता, जिस मुल्क पे कुर्बान हैं अशफाक और बिस्मिल II

काकोरी ट्रेन एक्शन में थी मिल्लत की रागिनी, क्रमण-क्रांति के प्रतिमान हैं अशफाक और बिस्मिल I

अशफाक और बिस्मिल हैं मुसल्लम ईमान में हिन्दू, हिन्दू में मुसलमान हैं अशफाक और बिस्मिल II

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आज अगस्त है यानी काकोरी क्रांति का वो यादगार दिन जब चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के दस वीरों ने उत्तर प्रदेश के बाजार नगर (काकोरी सिंग्नल) पर चलती ट्रेन को रोककर आङ्गल सत्ता का सरकारी खजाना लूट लिया था और सीधे बर्तानियाँ हुकूमत के विरुद्ध एलान जंग का शंखनाद किया था।

भारत माँ के चंद सपूतों द्वारा इस ऐतिहासिक परक्रम की महागाथा जिसका किस्सा कालांतर में ट्रेन डकैती के घिनौने नाम से कुख्यात रहा, उसे अब जाकर नीति नियंताओं ने  ट्रेन  एक्शन का नाम देकर वाकई सरहनीय कार्य किया है।

काकोरी ट्रेन एक्शन की सालगिरह पर इस शौर्यमयी कृति के दो महानयक पंडित राम प्रसाद बिस्मिल एवं क्रांतिवीर अश्फाक उल्ला खान दोनों हुतात्माओं को आदरांजलि अर्पित करते हुए वीर रस की मेरी अबतक की सर्वश्रेष्ट कविता सादर प्रेषित है।

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भव्या प्रभात चंद्रा

सेंट जेवियर्स हाई स्कूल, अँधेरी पूर्व मुंबई

ईमेल : prabhatchandramalpur@gmail.com

यूट्यूब : Bhavya Prabhat Chandra

                                                  क्रांति बल्लभ काकोरी वीर

वो वीर कहाँ जो अपनी खातिर संग्राम धरा पर लड़तें हैं अहले-गहले ही द्रोह धव बनकर अमर कृतियाँ गढ़ते हैं I

जो लड़े स्वतन्त्रता की खातिर जल गए इंकलाबी शोलों पर, निखिल विश्व उनको पूजेगा सजल नेत्र में जल भरकर II

यह परम वीर अशफाक-बिस्मिल के महासमर की गर्जना है काकोरी से नैपुण्य क्रान्ति अमोघ गल्प व्यूहरचना है I

यह रोशन सिंह-राजेंद्र लाहिड़ी के बलिदान का किस्सा है, गोरों के विरुद्ध स्वातन्त्र समर का अजब अनूठा हिस्सा है II

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राष्ट्रपिता के शांतिपथ पर जलियावाला बाग़ हुआ, दस मिनट में सोलह सौ पचास राउंड गोलियों से वीभत्स रक्तपात हुआ I

था सत्यपाल और सैफुद्दीन की गिरफ़्तारी का शांत विरोध, स्वर्ण मंदिर का वो बाग़ पुनः कत्लगाह बना फिर बढ़ा आक्रोश II

फिर पूर्वांचल के सारे किसानों ने चौरा-चौरी में क्रोध किया, भारत माँ के मुठ्ठी भर वीरों फिर क्रांति का जयघोष किया I

उस गगनभेदी चुनौती से गोरों की सत्ता दहली थी, क्या एलिजाबेथ? क्या वायसराय ? फिरंगी हुकूमत सहमी थी II

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तत्क्षण बिस्मिल और अश्फाक ने भी अहिंसा का दामन छोड़ दिया, माँ भारती के सपूतों ने सत्याग्रह से मुख मोड़ लिया I

ना तो रुपए थे ना ही जन समर्थन जो शास्त्र क्रांति को बल देते, हथियारों के बिना शतवीर भला ऐसे कैसे लोहा लेते?

शांति पाठ को सुनकर ही वीरों ने शास्त्र को त्यागा था, सत्य अहिंसा सात्विकता ने ही अखंड भारत को लूटा था I

धर्मान्धता, अछूत और जातिवाद में पूरा जयकाव्य विभाजित था, एकता बगैर आर्यव्रत अपना कई युगों से शापित था II

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वो श्रावण मास की सप्तमी थी राहू कुलिक यमगण्ड काल, नौ अगस्त सन पच्चीस को रणवीरों ने इतिहास लिखा I

था शूल गण्ड का प्रबल योग या स्वयं रूद्र का महाकोप काकोरी में जो काण्ड हुआ क्रांति का गौरवगान हुआ II

दस वीर नहीं वे शिवगण थे, रणधीर, अजेय रणबाँकुड़े भी, लखनऊ से नौ मिल पहले ही बाजार नगर में कांड हुआ I

उस गगनभेदी चुनौती से गोरों की सत्ता दहल गई क्या एलिजाबेथ? क्या वॉयसराय? बर्तानियाँ हुकूमत सहम गई II

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लगान की रकम सराहनपुर से ८ डाउन पैसेंजर से निकली, बिस्मिल चढ़े हरदोई में संग उनके थे चंद्र-गुप्त-लाहिड़ी I

राजेंद्र ने ट्रैन की चैन खींची मन्मथ ने जर्मन माउजर निकाल लिया, गोरों के खजाने को बस दस वीरों ने था उड़ा लिया II

आजद-बिस्मिल ने बाहुबल से खजाने पर अधिकार किया, हथौड़ा लेकर फिर अशफाक ने ताले पर था वार किया I

लखनऊ स्टेशन के ठीक पहले लौहपथगामिनी रोक कर कांड हुआ, काकोरी में जो काण्ड हुआ क्रांति का गौरव गान हुआ II

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वो कांड नहीं था निज स्वराज्य के लिए वीरों का सिंहनाद, दस वीरों ने बस दस पल में अंग्रेजों का खजाना लूट लिया I

छीयालिस सौ एक रुपए पंद्रह आने और छह पाई ही लूटी थी, चार जर्मन माउजर से चंद वीरों ने हुक्मरानों को चुनौती दी थी II

वे शिवगण थे? या धर्मवीर? या देवराज के सैनिक थे? सन सन्तावन के बाद पुनः भीषण करलव संग्राम हुआ I

उन वीरों की क्रोधाग्नि से अप्रतिम द्रोह प्रतिमान हुआ, काकोरी में जो काण्ड हुआ क्रांति का गौरव गान हुआ II

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यात्री अहमद अली कौतुहल वश ट्रेन से जैसे ही कूदा था, घबराहट में बन्दूक चली फिर मन्मथ को पछतावा था I

इस एक मौत के कारण ही पूरा एक्शन बदनाम हुआ, काकोरी में जो काण्ड हुआ क्रांति का गौरव गान हुआ II

गहमा-गहमी में चादर बनारसी की घटना स्थल पर छूट गई, शिनाख़्त हुई थी धोबी से जिसके दम पर तप्तीश हुई I

बिना बैरिस्टरी के बिस्मिल की पैरवी केस की सुनवाई दस माह चली, काकोरी में जो काण्ड हुआ क्रांति का गौरव गान हुआ II

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खान बहादुर तस्दुक हुसैन ने ४० पूतों को गिरफ़्तार किया, जज हैमिल्टन की ज्यादती करके न्याय व्यवस्था को बर्बाद किया I

अग्रेजों ने इस मुकदमें में दस लाख की दौलत फूंकी थी, २९ सपूतों पर राजद्रोह अभियोग मुकदमें की सुनवाई दस माह चली II

थी गोविंद पंत की फीस बहुत वकील बी.के चौधरी ने पैरवी, की फिर सुनवाई के उस महा प्रपंच में हरकारों ने खूब बेशर्मी की I

महामना की दया याचिका को वायसराय एडवर्ड फैड्रिक ने ठुकार्या था साबरमती के परम संत को चुप रहना ही भाया था II

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जेल में अनवरत सत्याग्रह से अभियुक्तों ने खिलाफत की, आमरण अनशन करके मानवीय अधिकारों की प्राप्ति की I

पूरा जेल प्रशासन और कचहरी उनपर जान छिड़कता था, अहले हिन्द के बलिदानी पुत्रों को मिलकर वंदन करता था II

२२ अगस्त १९२७ के दिन परवानों को परमान मिला, आजदी के चारों दीवानों को शहादत का अमोघ वरदान मिला I

दंड संहिता की काली धारा राज द्रोह लगाकर सजा मिली, फिर भारत की सुप्त क्रांति को प्राणर्पण की सौगात मिली II

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बिस्मिल,लाहिड़ी, रोशन और अशफाक चारों को मिली सजा ए मौत, और मन्मथनाथ को १४ वर्षों तक सेन्युलर जेल काला पानी I

दोनों शचीन्द्र, योगेश, मुकुन्दी और गोविन्द को बामुशक़्क़त उम्र-कैद, राम, सुरेश और विष्णु को दस वर्षों का बनवास मिला II

राम लाल, भूपेन्द्र और बनवारी लाल ने भी भोगा था पांच वर्षों का जेल, प्रणवेश को लिखावट के कारण बस चार साल की जेल हुई I

२३ छूटे लाल छूटे बाइज्जत अन्य वीरों को ३ साल तक की सजा मिली, काकोरी, के ट्रेन एक्शन से सम्पूर्ण क्रांति की हवा चली II

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मृत्युदंड के विरुद्ध महामना ने दया याचिका दायर की, लालजी-जिन्ना-केलकर और पन्त ने विलियम मोरिस के समक्ष पैरवी की I

७८ गणमान्यों की दया याचिका को अन्यायी वायसराय ने जब ठुकराया था, साबरमती के परम संत को चुप रहना ही भाया था II

प्रिवी कौन्सिल में बैरिस्टर मोहन लाल ने क्षमादान की की अंतिम याचना की, सत्ताधीशों को माफी कहाँ बस फँसी की हीजिद थी I

गोरों से जीवन दान कहाँ? शतवीरों को यशगान मिला, चारों वीरों को कलेण्डर वर्ष की अंतिम माह में शहादत का वरदान मिला II

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सत्रह दिसंबर सन सताइस के दिन राजेंद्र लाहिड़ी ने बलिदान दिया, उस सपूत ने गोंडा जेल से आजदी का पैगाम दिया I

गोरखपुर में उन्नीस दिसंबर को बिस्मिल ने हंसकर शहादत दी, पुनर्जन्म की दुआ पढ़कर अशफाक ने जन्नत प्रस्थान किया II

फैजाबाद जेल में ही ठाकुर रौशन सिंह ने उसी दिन प्राणाहुति दी, बेटी को ब्याहे बिन ही वीर पिता ने अपनी सर्वहुति दी I

आजाद वतन करवाने को उन वीरों ने बलिदान दिया, काकोरी में जो काण्ड हुआ क्रांति का गौरव गान हुआ II

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करोरी के दुर्गम रण को क्यों हिंदुस्तानी भूल गए? हम बिस्मिल-अशफाक की दोस्ती की अनमोल कहानी भूल गए?

है रक्त एक पर धर्म के कारण हिन्दू-मुस्लिम बँट जाते हैं, मंदिर-मस्जिद के चक्कर में हम देश बांटते जाते हैं I

सन सैतालिस में देश बंटा फिर कश्मीर-महाराष्ट्र-गुजरात जला, अब रोज ख़ुशी के दिये नहीं बर्बादी के अंधियारे हैं I

नेता जनता को जात-धर्म-आरक्षण के नाम पर लड़वाते हैं, उद्योगपतियों का खजाना भरकर वे देश बेचते जाते हैं II

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कुछ सदन वीर विद्यार्थियों को आतंकी कहकर चिढ़ाते हैं, लुटियंस दिल्ली में हालत चाहे जैसे भी हों सफेद कौए मौज मनाते हैं I

क्यों काकोरी ट्रेन एक्शन अबतक पाठ्य पुस्तकों को रास नहीं? बिस्मिल-रोशन-अशफाक-लाहिड़ी को भारत रत्न का अधिकार नहीं?

पिछले पच्चतर सालों तक काकोरी ट्रेन डैकती थी, जिस महासमर को नीति नियंता ने अब ट्रेन एक्शन का है नाम दिया I

इन्कलाबी के जनक, क्रांति के उत्कर्षकों की ये भूली हुई कहनी है, निज ‎रक्त चढ़ाकर उन बेटों ने स्वाधीनता का है गर्व दिया II

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ये हिन्दुस्तान की मिट्टी है गंगा जमुनी तहजीब यहाँ, हम सनातनधर्मी भले हों लेकिन मानवता का है स्वर्ग यहाँ I

दोराहे पर जब देश खड़ा हो मानव धर्म चुनना होगा, धर्मान्धता, जातिगत भेद-भाव का समूल नष्ट करना होगा II

यह आर्यव्रत की मिटी है सब धर्मों को अधिकार यहाँ, मिसाइलमैन की भांति राष्ट्रपति पद है वनपुत्री को आज मिला I

स्वतंत्र वीरों की तुर्बत  पर कोई तो दीया जला देता, उन नेकात्माओं के क्रांति गीत को हर हिन्दुस्तानी गा देता II

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जय हिंद जय भारत वंदे मातरम्


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