‘मैंने भी कुरान पढ़ी है… बुजदिल आतंकियों’- बिंद्रू की बेटी का हौंसला बरकरार

'रोना नहीं- यह बंदूकधारियों को श्रद्धांजलि होगी': जम्मू-कश्मीर केमिस्ट की बेटी को मार डाला
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नई दिल्ली / श्रीनगर (एजेंसी)। श्रीनगर में आतंकी कश्मीरी पंडित माखन लाल बिंद्रू की निर्मम तरीके से हत्या करने में जरूर सफल रहे, लेकिन उनकी बेटी का हौंसला और हिम्मत को नहीं तोड़ पाए। सोशल मीडिया पर मातम की इस घड़ी में बिंद्रू की बेटी श्रद्धा बिंद्रू की आतंकियों को ललकार वायरल हो रही है। श्रद्धा ने कुरान का जिक्र के साथ अपने पिता के बेरहम हत्यारों को ललकारा है और धर्म के नाम पर बेगुनाह लोगों की हत्या कर रहे आतंकियों को कुरान का पाठ भी पढ़ाया है।

‘जो चोला है, यह तो बदल जाएगा…’

श्रद्धा ने आतंकियों को चुनौती देते हुए कहा कि उनके पिता के शरीर को जरूर खत्म किया गया है, लेकिन उनकी आत्मा अमर है। श्रद्धा ने कहा कि हिंदू होते हुए भी उन्होंने कुरान को पढ़ा है। कुरान कहती है कि शरीर का जो चोला है, यह तो बदल जाएगा। लेकिन जो इंसान का जज्बा है, वह कहीं नहीं जाएगा।

‘जिगर होता तो सामने आते’

उन्होंने कहा कि उनके पिता कि तब सिर में गोली मारकर हत्या की गई, जब वह काम कर रहे थे। अगर आतंकियों में जरा भी जिगर होता तो सामने आकर उनसे बहस करते सोशल मीडिया पर श्रद्धा बिंद्रू की यह दहाड़ वायरल है। लोग इस घड़ी में उनके हौसले की सलाम कर रहे हैं

दरअसल, माखन लाल बिंदरू की बेटी श्रद्धा बिंदरू ने मीडिया से बातचीत में कहा कि मेरे पिता एक कश्मीरी पंडित हैं, वह कभी नहीं मरेंगे। आतंकी सिर्फ शरीर को मार सकते हैं, मेरे पिता हमेशा आत्मा के रूप में जीवित रहेंगे। उन्होंने कहा कि अगर हिम्मत है तो सामने आओ, तुम लोग केवल पत्थर फेंक सकते हो या पीछे से गोली चला सकते हो। तुमने एक शरीर उड़ा दिया लेकिन मैं अपने पिता की बेटी हूं, हिम्मत हो तो आओ मेरा सामना करो और मुझसे बातचीत करो। मैं एक एसोसिएट प्रोफेसर हूं, मेरे पिता ने साइकिल से शुरूआत की, मेरा भाई मधुमेह रोग विशेषज्ञ है, मेरी मां दुकान में बैठती है, यही माखन लाल बिंदू ने हमें बनाया है। वह फाइटर थे, वह कभी मर नहीं सकते।

माखन लाल बिंदरू की बेटी श्रद्धा बिंदरू का यह वीडियो वायरल हो रहा है। माखन लाल बिंदरू की हत्या पर कश्मीरी पंडित समुदाय समेत देशभर के अन्य हिस्सों से भी तमाम लोगों ने दुख व्यक्त किया है। 70 साल के बिंदरू एक कश्मीरी पंडित थे और श्रीनगर के पुराने निवासी थे। उन्होंने कश्मीर तब भी नहीं छोड़ा जब वहां आतंकवाद चरम पर था और आतंकवादी विशेष रूप से कश्मीरी पंडितों को निशाना बना रहे थे। उनकी दुकान पर लोग दवाइयां खरीदते थे।


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