Thursday , 16 August 2018
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‘द्रविड़ योद्धा’ का निधन

  • करूणानिधि के निधन से पसरा मातम
  • स्टालिन की समर्थकों से शांति की अपील

चेन्नई। डीएमके (द्रमुक) अध्यक्ष एम करूणानिधि का मंगलवार को लंबी बीमारी के बाद चेन्नई के कावेरी अस्पताल में निधन हो गया। यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (यूटीआई) से पीडि़त 94 वर्षीय एम करुणानिधि को कुछ दिन पहले ही अस्पताल में भर्ती कराया गया था। पिछले कुछ दिनों से उनकी हालत में सुधार देखा जा रहा था लेकिन सोमवार रात को उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। डॉक्टर उनकी सेहत पर लगातार नजर बनाए हुए थे और आईसीयू में विशेष डॉक्टरों का एक पैनल उनका इलाज कर रहा था। कावेरी हॉस्पिटल प्रशासन की ओर से जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक करूणानिधि ने शाम को 6 बजकर 10 मिनट पर अपनी अंतिम सांस ली।
करूणानिधि के निधन पर प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर शोक जताया है। उन्होंने ट्वीट किया, कलाइगनार करूणानिधि क्षेत्रीय महात्वाकांक्षाओं और राष्ट्रीय प्रगति के साथ खड़े रहे। वह तमिल लोगों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध रहे और उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि तमिलनाडु की आवाज प्रभावी रूप से सुनी जाए।
5 बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और 12 बार विधानसभा सदस्य रहे डीएमके प्रमुख करूणानिधि भी ऐसे ही एक शख्स थे। भारतीय राजनीति में करूणानिधि एक अलग ही पहचान रखते थे। एक राजनेता के साथ करूणानिधि तमिल सिनेमा जगत के एक नाटककार और पटकथा लेखक भी रहे। उनके प्रशंसक उन्हें कलाईनार कहकर बुलाते थे। इसका मतलब होता है तमिल कला का विद्वान।
पहली बार करूणानिधि ने 1969 में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। 1969 में डीएमके के संस्थापक सीएन अन्नादुरई की मौत के बाद से करूणानिधि के हाथ में पार्टी की कमान थी। करूणानिधि को तिरूचिरापल्ली जिले के कुलिथालाई विधानसभा से 1957 में तमिलनाडु विधानसभा के लिए पहली बार चुना गया था। 1961 में वो डीएमके कोषाध्यक्ष बने और 1962 में राज्य विधानसभा में विपक्ष के उपनेता बने। 1967 में डीएमके जब सत्ता में आई तब करूणानिधि सार्वजनिक कार्य मंत्री बने।
करूणानिधि ने महज 14 की उम्र में राजनीति में कदम रखा। दक्षिण भारत में हिंदी विरोध पर मुखर होते हुए करूणानिधि हिंदी हटाओ आंदोलन में शामिल हो गए। 1937 में स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य करने पर बड़ी संख्या में युवाओं ने विरोध किया, उनमें से करूणानिधि एक थे। इसके बाद उन्होंने तमिल भाषा को हथियार बनाया और तमिल में भी नाटक और स्क्रिप्ट लिखने लगे।
1957 में पहली बार जब करूणानिधि विधायक बने थे तब देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू थे। इसके बाद जब वो पहली बार मुख्यमंत्री बने तो इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं। वो तीसरी बार तब मुख्यमंत्री बने जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। चौथी बार जब वो मुख्यमंत्री बने तब नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे और पांचवी बार बने तो मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे।
करूणानिधि ने तीन शादियां कीं। उनकी पहली पत्नी पद्मावती, दूसरी पत्नी दयालु अम्माल और तीसरी पत्नी रजति अम्माल हैं। उनकी पहली पत्नी का निधन हो गया है। उनके चार बेटे और दो बेटियां है। एमके मुथू पद्मावती के बेटे हैं, जबकि एमके अलागिरी, एमके स्टालिन, एमके तमिलरासू और बेटी सेल्वी, दयालु अम्मल की संतानें हैं। उनकी तीसरी पत्नी रजति अम्माल की बेटी कनिमोझी हैं।
एमके स्टालिन ने डीएमके के काडर से किसी भी तरह की हिंसा से दूर रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि शांति बनाए रखें, क्योंकि यही अपने नेता के प्रति सम्मान जाहिर करने का तरीका है।
इसी साल 3 जून को करूणानिधि ने अपना 94वां जन्मदिन मनाया। ठीक 50 साल पहले 26 जुलाई को ही उन्होंने डीएमके की कमान अपने हाथ में ली थी। लंबे समय तक करूणानिधि के नाम हर चुनाव में अपनी सीट न हारने का रिकॉर्ड भी रहा।

 

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