बिहार चुनाव के बाद कांग्रेस में गुटबाजी परवान पर

बिहार चुनाव के बाद कांग्रेस में गुटबाजी परवान पर
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अपना कद बढ़ा दूसरे दल से सौदा करने के जुगाड़ में नेता

दिल्ली को भी सियासी ‘पिच’ से वास्ता कम

पटना (एजेंसी)। बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद कांग्रेस की प्रदेश इकाई में गुटबाजी परवान पर है। खास बात यह है कि इस पर काबू पाने में प्रदेश नेतृत्व भी खुद को सक्षम नहीं पा रहा है। चुनाव परिणाम आने के बाद से ही राजद के ही कई नेता कांग्रेस को इस बात के लिए दोषी ठहराते रहे हैं कि उसी की वजह से महागठबंधन बहुमत से दूर रहा और प्रदेश में उसकी सरकार नहीं बन पाई। इसके बावजूद कांग्रेस में न तो संगठन के स्तर पर मजबूती लाने की कोशिश की जा रही है और न ही इसके अंदर पनप रहीं विक्षुब्ध गतिविधियां और असंतोष के सुरों को शांत किया जा सका है।

कांग्रेस के अंदर से यह बात बार-बार उठती रही है कि टिकट बंटवारे में बड़े और जिम्मेदार नेताओं के स्तर पर मनमानी की गई। इसके कारण ही पार्टी का प्रदर्शन चुनाव में काफी खराब रहा। इसके बाद भी कांग्रेस का कोई भी प्रमुख नेता इस पर अपना स्पष्टीकरण नहीं दे सका है। यही नहीं, प्रदेश अध्यक्ष डॉ. मदन मोहन झा के अस्तित्व पर भी सवाल उठ रहा है कि जिस मिथिलांचल क्षेत्र से वह खुद आते हैं, उसी इलाके में कांग्रेस का सफाया हो गया।

कांग्रेस के अंदर गुटबाजी नई बात नहीं

वैसे, गुटबाजी कांग्रेस के लिए कोई नई बात नहीं है। लेकिन, सत्ता से बाहर होने के बाद गुटबाजी चरम पर पहुंच गई। पार्टी सूत्रों के मुताबिक कार्यकर्ता तो पहले ही दूसरे दलों में अपना ठौर बना चुके हैं। नेता केवल अपना कद बड़ा करने के लिए पार्टी से जुड़े रहे। राजनीतिक जगत में उनकी पूछ बढ़ी तो अपना ठौर बदल लिये। कांग्रेस की स्थिति यह है कि अब पार्टी के लिए काम करने वालों की संख्या अंगुली पर गिनने लायक बची है। हर कोई अपना कद बढ़ाने के लिए पार्टी में ओहदा खोजता है। ओहदा मिला तो दूसरे दल से तोलमोल शुरू। पूछ बढ़ी तो निकल लिये वरना, कांग्रेस तो है ही अपनी। यही कारण है कि कांग्रेसी जमीन तलाशने की जगह हाईकमान के पास अपनी लॉबी मजबूत बनाने वाले नेता की खोज करते हैं।

जिसकी लॉबी मजबूत, उसे आलाकमान से मिलती है हरी झंडी

पार्टी नेताओं की मानें तो दिल्ली को भी बिहार ‘पिच’ से वास्ता कम ही दिखता है। वहां से भी उसी को हरी झंडी मिलती है जिसकी लॉबी मजबूत है। दिल्ली यह जानने की कोशिश भी नहीं करती कि बिहार कांग्रेस को जरूरत क्या है। यही कारण है कि दो चुनाव बीत गये लेकिन पार्टी की प्रदेश कमेटी मात्र कार्यकारी अध्यक्ष के चार पिलरों के सहारे चल रही है। ऐसे भी प्रदेश अध्यक्ष ही अपने इलाके में कांग्रेस को नया जीवन नहीं दे सके। लंबे समय के बाद मिथिलांचल के नेता को प्रदेश की कमान मिली, लेकिन पार्टी का सफाया उसी इलाके में हो गया। हाईकमान की रूचि का अंदाजा इसी से लगता है कि दो चुनाव बीत जाने के बाद भी अब तक प्रदेश कांग्रेस की कमेटी नहीं बन पाई है।

पहले भी दिल्ली से लेकर पटना तक बिहार के नेता अलग-अलग गुटों में बंटे रहे हैं। इस कड़ी में बिहार से जुड़े कई दिग्गज नेताओं के भी नाम हैं। यही कारण है कि डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के बाद शायद ही कोई ऐसा कांग्रेसी मुख्यमंत्री हुआ जो लगातार पांच साल तक कुर्सी पर रहा हो। तब कांग्रेस की बुनियाद मजबूत थी और बड़े-बड़े झोंका सहने में परेशानी नहीं होती थी। लेकिन, अब तो पार्टी को अपनी जमीन तलाशनी पड़ रही है। बैसाखी के सहारे जीने की आदत सी पड़ गई है।


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