शिक्षा के साथ संस्कार भी जरूरी

Along with education, culture is also necessary.
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मुंबई। पनवेल में पर्यूषण के सातवें दिन संस्कारों का शंखनाद विषय पर प्रवचन हुआ। धर्मसभा में महासती संयमलता ने कहा कि आज शिक्षा बहुत है संस्कार रत्ती भर भी नहीं हैं। शिक्षा के बोझ में दबकर संस्कारों का दम निकल रहा है। शिक्षा का पश्चिमीकरण हो रहा है। अपनी संतान को भारतीय संस्कृति का बोध कराएं। नारी शिक्षा ही नहीं देती संस्कार भी देती है। बालक को शिक्षित करने से पहले पालक को शिक्षित और संस्कारित होना होगा। नारी को शिक्षित करने की पहली आवाज़ धरती पर जिन्होंने उठाई, वह थे प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव, जिन्होंने अपनी पुत्रियों को पहली बार शिक्षा प्रदान की। दोनों पुत्रियों को अपने पास बिठाकर बड़ी बेटी ब्राह्मी को अंक ज्ञान और छोटी बेटी सुंदरी को अक्षर ज्ञान दिया। सबसे पहले शिक्षा प्राप्त करने वाली नारी ही नहीं, ब्राह्मी और सुंदरी सबसे पहले संस्कार प्राप्त करने वाली भी थी। साध्वी कमलप्रज्ञा ने अंतगढ़ सूत्र का वाचन किया। मेवाड़ नवयुवक मंडल अध्यक्ष दीपक परमार ने विचार व्यक्त किए। “जैसा करो वैसा भरो” विषय पर नाटिका की प्रस्तुति दी गई। साध्वी सौरभप्रज्ञा ने कल्पसूत्र वाचन किया।


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