Wednesday , 20 November 2019
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सिंहाड़ा में पायरोफ्लाइट खदान के अरावली रेंज का घोटाला खुला

खदान निरस्त, कराई बंदखान निदेशालय ने कराई जांच, पुराने अफसरों के घोटाले खुले
109 मीटर ऊंची पहाड़ी को नाप में 100 मीटर से छोटी बता बांटी थी खदान की रेवड़ी
नगर संवाददाता . उदयपुर (नगर संवाददाता)। जिले की साकरोदा पंचायत के सिंहाड़ा में आखिरकार 11 साल बाद अरावली रेंज में 100 मीटर ऊंची पहाडिय़ों में सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबंधित खनन आदेशों की अवहेलना कर दी गई खदान के घोटाले का खुलासा हो गया। इस खदान का सर्वप्रथम प्रात:काल ने 7 मार्च और 9 मार्च 2019 के अंकों में समाचार प्रकाशित कर खुलासा किया गया था। खबरों पर चेते खान निदेशालय ने खदान की तकनीकी जांच कराई तो घोटालों की परतें खुलती चली गईं। जांच रिपोर्ट में भयंकर गड़बड़ी उजागर होने पर खान निदेशालय के आदेश पर खनि अभियंता कार्यालय उदयपुर ने इस खदान को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर खनन बंद करवा दिया है। खान विभाग के तत्कालीन अधिकारियों ने मिलीभगत कर यह सारा घोटाला साकरोदा के सिंहाड़ा में पायरोफ्लाइट मिनरल वाली खान मालिक रतन निहलानी (अब भावना निहलानी के नाम पर) एमएल नंबर 18/2001 की खदान के लिए किया। इस खदान का क्षेत्रफल 4.8181 हैक्टेयर था। राज्य सरकार के आदेश पर 11 मई 2010 से इस खदान को आवंटित किया गया था।खनि अभियंता की 2007 की रिपोर्ट की दरकिनार
इस खदान की पूर्व में अरावली रेंज की जांच हुई थी, जिसमें यह खदान प्रतिबंधित 100 मीटर ऊंची पहाडिय़ों में आने की पुष्टि हुई थी। निदेशालय ने वर्ष 2006 में खनि अभियंता को सुप्रीम कोर्ट के 8 अपे्रल 2005 के अरावली में आवंटन पर प्रतिबंध के आदेश भेजकर इस खदान के आवेदन को लंबित रखने को कहा था। खनि अभियंता ने वर्ष 2007 में खान निदेशालय को प्रस्ताव भेजकर बताया था कि इस खदान का अपर कंटूर 646 मीटर और लोवर कंटूर 540 मीटर पाया गया था। इस हिसाब से दोनों का अंतर 106 मीटर होने से यह क्षेत्र अरावली रेंज की प्रतिबंधित खनन वाली श्रेणी में आता है। खनि अभियंता ने इस तकनीकी रिपोर्ट के साथ ही खदान का आवेदन निरस्त करने की सिफारिश की थी। लेकिन खनि अभियंता की इस रिपोर्ट को आगे घोटाला करते वक्त दरकिनार कर दिया गया।
घोटाला करने के लिए मामले को दिया यू-टर्न
खनि अभियंता की उपरोक्त रिपोर्ट को एक तरफ रखकर निदेशालय के तत्कालीन अधिकारियों ने खान मालिक ने नए आवेदन पर वर्ष 2008 में अधीक्षण खनि अभियंता उदयपुर और अधीक्षक भू वैज्ञानिक (फॉस्फेट) उदयपुर की एक कमेटी गठित कर खदान अरावली रेंज में आने या नहीं आने की रिपोर्ट तलब की। कमेटी ने अपनी फील्ड रिपोर्ट के अनुसार प्रस्ताव बनाकर भेजने के खनि अभियंता को आदेश दे दिए। इस पर खनि अभियंता ने फिर नया प्रस्ताव बनाकर कह दिया कि उक्त खदान का क्षेत्र अरावली की प्रतिबंधित श्रेणी में नहीं आता है। इसलिए खदान स्वीकृत कर दी जाए। फिर इस नई रिपोर्ट पर खदान आवंटित करवा दी गई।अब जीटी शीट की जांच में खुली घोटाले की परतेंठ्ठ अब मामला फिर उठा तो निदेशालय ने जीटी शीट पर क्षेत्र की अरावली रेंज की तकनीकी जांच की, जिसमें पता चला कि तत्कालीन अधिकारियों की पहले गठित की गई कमेटी को केवल संयुक्त रूप से खदान अरावली रेंज में आती है या नहीं, इसकी जांच करने के लिए कहा गया था न कि कमेटी को मौका निरीक्षण करके रिपोर्ट देने के आदेश हुए थे। कमेटी को केवल जीटी शीट पर खदान क्षेत्र की जांच करनी थी। क्योंकि मौके पर अपर और लोवर कंटूर की स्थिति सही नहीं आती है और यदि पहाड़ी की चोटी ही काट दी जाए तो मौके पर पहाड़ी 100 मीटर से कम ऊंचाई की ही पाई जाती है। जो कि पहाड़ी मूल स्वरूप वाली ऊंचाई नहीं होती। राज्य सरकार ने ज्योलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के आदेश के तहत पहाड़ी के स्लोप को भी अरावली में माना है। इसलिए अरावली की जांच जीटी शीट या टोपोशीट पर करनी थी, जो नहीं हुई। जबकि अरावली की जीपीएस और अल्टीमीटर से की जाने वाली जांच गलत है और इसके सरकार ने कभी आदेश भी नहीं दिए।
ठ्ठ पूर्व में कमेटी ने इस खदान का अपर कंटूर 646 मीटर ही बताया था लेकिन लोवर कंटूर 550 मीटर बता दिया जबकि जीटी शीट पर हमेशा कंटूर लेवल 20 मीटर के अंतर में ही बढ़ता या घटता है। यह कंटूर 540 मीटर हो सकता था या 560 मीटर होता लेकिन कमेटी ने 550 मीटर का कंटूर बता दिया जो तकनीकी पैमाने में कभी नहीं आता है।
ठ्ठ पूर्व कमेटी ने वास्तविक लोवर कंटूर 540 मीटर की आड़ में इसे बढ़ाकर 550 मीटर बता दिया और अपर कंटूर 646 में से इसे घटाकर 96 मीटर ऊंची पहाड़ी कागजों में बताकर इसे 100 मीटर की प्रतिबंधित श्रेणी से बाहर निकालकर आवंटित करवा दिया। जबकि वास्तव में 646 में से वास्तविक लोवर कंटूर 540 मीटर घटाने पर अंतराल 106 मीटर पाया गया है और यह 100 मीटर से अधिक होने पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत अरावली की प्रतिबंधित रेंज में आ रहा है। इसलिए यह खदान खनन के लिए कभी आवंटित की ही नहीं की जा सकती थी।

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