Wednesday , 20 November 2019
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‘संसदीय व्यवस्था संघर्ष का परिणाम’

पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा-
जयपुर (कार्यालय संवाददाता)। पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा है कि भारतीय संसदीय व्यवस्था न तो हमें आकस्मिक मिली और न ही ब्रिटिश सरकार के उपहार में मिली है बल्कि इसे सतत संघर्ष से बनाया है।
राष्ट्रमंडल संसदीय संघ एवं लोकनीति के संयुक्त अधिवेशन में ‘चेंङ्क्षजग नेचर ऑफ पार्लियामेंट डेमोक्रेसी इन इंडियाÓ विषय पर गुरूवार को आयोजित कार्यशाला को सम्बोधित करते हुए मुखर्जी ने कहा कि संविधान बदलने का अधिकार मिलने के बाद इसमें कई संशोधन हुए, लेकिन इसकी मूल आत्मा को जीवित रखा गया है।
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका से पहला टकराव राजा महाराजाओं के विशेषाधिकार खत्म करने के मामले में हुआ। जब यह कहा गया कि मौलिक अधिकार को खत्म करने का संसद को अधिकार नहीं है, जबकि यह मौलिक अधिकार का मामला नहीं था।
मुखर्जी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 368 में संशोधन के बाद संसद में दो तिहाई बहुमत से संविधान में बदलाव करने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के साथ टकराव हमेशा बुरा नहीं कहा जा सकता। केंद्र और राज्यों में अलग अलग दलों की सरकार को लोकतंत्र की खूबसूरती बताते हुए कहा कि 1952 से 1967 तक केंद्र एवं राज्यों में कांग्रेस की सरकारें रहीं हैं, लेकिन इसके बाद इसमें बदलाव आ गया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस भाजपा सहित किसी भी दल की सरकार को 51 प्रतिशत मत नहीं मिले। जिससे यह संदेश जाता है कि ऐसी सरकार को सभी को साथ लेकर चलना चाहिए।

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