राजनीति के गलियारे

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राजनीति के गलियारे
मीरा पर दांव लगाएगी कांग्रेस!
बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर अंदर खाने एक चर्चा यह है कि कांग्रेस वहां कोई बड़ा दांव लगा सकती है। वैसे तो आज की तारीख में कांग्रेस राजद के साथ गठबंधन का हिस्सा है और राजद तेजस्वी यादव के चेहरे पर ही विधानसभा का चुनाव लडऩे का पक्का इरादा कर चुकी है। उधर विपक्ष के लगभग सारे सीनियर लीडर ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में यह मानते हैं कि नीतीश कुमार जैसे परिपक्व चेहरे के आगे तेजस्वी का टिक पाना आसान नहीं है। एक राय यह भी है कि तेजस्वी को सीएम का चेहरा घोषित करने के बजाय राजद बगैर चेहरे के चुनाव में जाए तो बेहतर होगा। इस बीच कांग्रेस के अंदर एक बड़ा ‘धमाकाÓ करने की योजना पर विमर्श शुरू हो गया है। कांग्रेस की टॉप लीडरशिप और राज्य के कुछ सीनियर नेताओं के बीच इस बात पर विमर्श शुरू हो गया है कि पार्टी मीरा कुमार को अपना सीएम चेहरा घोषित कर दे। इससे एक साथ कई फायदे देखे जा रहे हैं। एक तो उनका राजनीतिक कद किसी भी सूरत में नीतीश कुमार से कम नहीं है। राष्ट्रीय पहचान भी रखती हैं। बाबू जगजीवन राम की पुत्री होने के नाते उनकी राजनीतिक विरासत की मालकिन भी हैं। दलित चेहरे को सीएम उम्मीदवार बनाने से कांग्रेस को देश के दूसरे राज्यों में भी राजनीतिक लाभ मिलने की उम्मीद दिख रही है, खासतौर पर यूपी में। अगर मीरा कुमार को सीएम उम्मीदवार घोषित कर कांग्रेस चुनाव मैदान में उतरती है तो क्या राजद को यह स्वीकार होगा? कांग्रेस के एक सीनियर लीडर ने कहा, कांग्रेस को अपना फैसला सुनाना चाहिए। राजद को अगर वह फैसला स्वीकार है तो हमें साथ चलने में कोई ऐतराज नहीं, और अगर वह उन्हें स्वीकार नहीं है तो उन्हें उनका फैसला मुबारक और हमें हमारा। वैसे यूपी के २०१७ के चुनाव में कांग्रेस दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित को चेहरा घोषित करके सबको चौंका तो चुकी ही है।
नाराज क्यों हैं कुमारस्वामी
कर्नाटक में कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री रहे कुमारस्वामी मंगलवार को अचानक कांग्रेस पर फट पड़े। उन्होंने कांग्रेस को ‘हॉर्स ट्रेडिंग का दूसरा नाम बता डाला। बीजेपी ने उनकी ही सरकार गिराकर अपनी सरकार बनाई है, फिर ऐसे क्या समीकरण बदले कि कुमार स्वामी अचानक कांग्रेस पर हमलावर हो गए? कहा जा रहा है कि कांग्रेस ने अभी हाल में ही डी शिवकुमार को राज्य में पार्टी की कमान सौंपी है। शिवकुमार को ‘मैनेजमेंट मास्टर माना जाता है। कांग्रेस के भीतर वह ‘ट्रबल शूटर के नाम से जाने जाते हैं। कर्नाटक के बाहर भी पार्टी उनकी सेवाएं लेती है। अपने विधायक बचाने हों या विधायकों का ‘प्रबंध करना हो, शिवकुमार को ही आगे किया जाता है। देश के सबसे अमीर नेताओं में उनकी गिनती होती है। चुनाव के समय दाखिल हलफनामे के अनुसार वह करीब ७०० करोड़ के मालिक हैं। सबसे बड़ी बात यह कि वे वोक्कालिंगा समाज से आते हैं, जिससे कि देवगौड़ा परिवार भी है। कर्नाटक की सियासत में लिंगायत और वोक्कालिंगा का ही दबदबा है। लिंगायत समाज का सबसे बड़ा चेहरा बीएस येदियुरप्पा हैं, जो भाजपा में हैं। भाजपा उन्हीं को आगे कर सत्ता में आती रही है। वोक्कालिंगा समाज की राजनीति में । नुमाइंदगी देवगौड़ा परिवार करता रहा है, लेकिन कुमारस्वामी या यूं कहे कि देवगौड़ा परिवार को लगता है कि कांग्रेस ने राज्य में शिवकुमार को जिस तरह से आगे किया है, उससे उनके सियासी समीकरण बिगड़ सकते हैं। कांग्रेस की टॉप लीडरशिप ने एक तो शिवकमार को राज्य में संगठन के विस्तार के लिए पूरी स्वतंत्रता दी है और दूसरे खुद शिवकुमार आक्रामक राजनीति के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में कुमारस्वामी का कांग्रेस पर हमलावर होना स्वाभाविक है।
म.प्र. की नई लड़ार्ई
म.प्र. में ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद । कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई और बढ़ती दिख रही है। सिंधिया के साथ कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की शुरू से ही इसलिए नहीं पटती थी कि दोनों अपने मुकाबले जूनियर के लिए स्पेस छोडऩा पसंद नहीं कर रहे थे। हाल के वर्षों में कमलनाथ और दिग्विजय का सिंधिया से टकराव इसलिए और भी बढ़ गया था कि देर सवेर राज्य में पार्टी का चेहरा सिंधिया का बनना तय था, जबकि इन दोनों की चिंता अपने-अपने बेटों को राजनीति में स्थापित करने की थी। सिंधिया को हाशिए पर लाने के लिए कमलनाथ और दिग्विजय के बीच एका हुआ था। सिंधिया के बाहर जाने के बाद अब बेटों की लड़ाई खुलकर सामने आ गई है। पिछले दिनों दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह, जो कमलनाथ सरकार में मंत्री भी थे, को उनके जन्मदिन के मौके पर उनके समर्थकों की ओर से भावी मुख्यमंत्री के रूप में बधाई देते पोस्टर चस्पां किए गए। इसके बाद कमलनाथ के बेटे नकुल नाथ के समर्थकों ने पोस्टर जारी करके नारा दिया, ‘कमलनाथ जी का आदेश, । नकुलनाथ संभालो प्रदेश। दो राजपुत्रों के बीच जीतू पटवारी भी कूद पड़े हैं। उनके समर्थक पहले से ही उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में पेश कर रहे हैं। उनके लिए राज्य में नया नारा भी दे दिया गया है, ‘न राजा, न व्यापारी, अबकी बार जीतू पटवारी। पटवारी हाल के दिनों में कांग्रेस का नया चेहरा बनकर उभरे हैं। उन्हें राहुल और प्रियंका, दोनों का विश्वास हासिल है। कमलनाथ सरकार में राहुल की सिफारिश पर ही उन्हें मंत्री भी बनाया गया था। एक तरफ जब कांग्रेस के विधायकों के टूटने का सिलसिला जारी है, कांग्रेस के नेताओं की असली फिक्र पार्टी को टूटने से बचाने के बजाय अपने-अपनों को स्थापित करने की है।


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