बिछुड़े नेताओं को गले लगाने लगी ममता

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पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों के लिए एक साल से भी कम समय रह गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तृणमूल पार्टी के उन अविश्चसनीय नेताओं को फिर से जोडऩे के मिशन पर जुटी हुई हैं, जिन्हें वह पहले बाहर का रास्ता दिखा चुकी हैं। हाल ही में ममता बनर्जी ने पूर्व राज्यसभा सांसद कुणाल घोष को बंगाल के लिए प्रवक्ता नियुक्त किया। यह अपने आप में महत्वपूर्ण घटनाक्रम है क्योंकि ममता और घोष के संबंधवर्षों तक मधुर नहीं रहे। वास्तव में ममता सरकार द्वारा शारदा चिटफंड घोटाले में संदिग्ध संलिप्तता के चलते उन्हें गिरफ्तार किया गया और उन्हें तीन वर्ष जेल में बिताने पड़े थे। ममता ने घोष को पार्टी से निलंबित भी किया था। कुणाल घोष ने ममता की खुलेआम आलोचना करते हुए संकेत दिया था कि उनकी पार्टी शारदा घोटाले में लाभार्थी है। पश्चिम बंगाल में चर्चा यह है कि कुणाल घोष को अगले वर्ष विधानसभा चुनावों के लिए टिकट भी दिया जाएगा। ममता इस बात से चिंतित हैं कि भाजपा भी अविश्वसनीय तृणमूल नेताओं को शामिल करने की कोशिश कर रही है ताकि उन्हें कमजोर किया जा सके। इसीलिए हताश ममता अब ऐसे नेताओं को गले लगा रही हैं। इस बात की चर्चा है कि विद्रोही सांसद मुकुल राय भी तृणमूल में वापसी कर सकते हैं। मुकुल राय कभी बंगाल में भाजपा की योजना के केंद्र में थे लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के कमजोर प्रदर्शन के चलते मुकुल राय महत्व खो बैठे। भाजपा में मुकुल राय अब हाशिए पर हैं, इस बात का पता हाल ही में बंगाल से भाजपा सांसदों और नेताओं की बैठक से चलता है। मुकुल राय को बुलाया ही नहीं गया। प. बंगाल भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष को पता था कि मुकुल राय बैठक में भाग नहीं ले रहे। जब इस संबंध में उनसे पूछा गया तो दिलीप घोष ने जवाब दिया वे सभी भाग ले रहे हैं जिन्हें बुलाया गया। इसका अर्थ यही है कि राय को बुलाया ही नहीं गया था। रॉय अब कोलकाता में हैं और पार्टी में वापसी के इच्छुक हैं।
नीतीश की जिद
सितंबर तक बिहार में बाढ़ का प्रकोप थोड़ा कम हो जाएगा, इसके बाद यहां विधानसभा चुनाव की तैयारियां को पंख लग सकते हैं लेकिन इसके लिए सबसे बड़ी शर्त है कि नीतीश अपनी वह जिद छोड़ दें कि वे भाजपा से कम से कम 20 सीटें ज्यादा लड़ेंगे। भाजपा नीतीश को 5-7 सीटें ज्यादा देने को तैयार है। अगर भाजपा नीतीश में बात नहीं बनी तो बिहार में राष्ट्रपति शासन की आहट समझ लीजिए, अमित शाह के हाथों में तब होगी बिहार की बागडोर और भाजपा को तब अपने दम पर चुनाव कैसे जिताना है, यह उनसे बेहतर कौन जानता है, खास कर ऐसे वक्त में जब तेजस्वी भी भाजपा के भगवा तेज में बेतरह नहाए हुए हैं।


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