पांच अगस्त का अर्थ

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शशि शेखर
फैसला लागू होते ही तमाम बड़े नेता गिरफ्तार अथवा नजरबंद कर दिए गए। उमर अब्दुल्ला को छोड़ दें, तो महबूबा मुफ्ती सहित तमाम शीर्ष कश्मीरी नेता आज भी बंदिशों में हैं। पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। जम्मू-कश्मीर के अब तक के सबसे कद्दावर नेता शेख अब्दुल्ला को 8 अगस्त,1953 को नजरबंद किया गया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 अगस्त को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के ‘शुभारंभÓ समारोह में हिस्सेदारी करेंगे। क्या यह सिर्फ संयोग है कि ठीक एक साल पहले इसी दिन जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाने के साथ इस प्रदेश की सांविधानिक और भौगोलिक स्थिति में बुनियादी बदलाव कर दिए गए थे? क्या समाज और सियासत के अंतर्संबंधों पर इन फैसलों का कोई असर पडऩे जा रहा है? यह एक खुला रहस्य है कि भारतीय जनसंघ के स्थापना-काल से ही अनुच्छेद-370 और अयोध्या में ‘भव्यÓ राम मंदिर का निर्माण उसके प्रमुख एजेंडे में शामिल रहा है। इस नाते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनसंघ से उपजी भारतीय जनता पार्टी के ऐसे नेता साबित हुए हैं, जिन्होंने इस एजेंडे को अंजाम दिया। यही नहीं, तीन तलाक और सीएए जैसे मुद्दों पर भी उन्होंने अपनी पार्टी के एजेंडे, विचारधारा और हितों को तरजीह दी। एक राजनीतिज्ञ होने के नाते वह जानते हैं कि उनके ये फैसले देश के बहुसंख्यक लोगों को लुभाते हैं। इस नाते वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उस सपने को भी दम-दिलासा देते हैं कि देश के 51 फीसदी मतों पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा हो। क्या ऐसा संभव है? इस पर आगे चर्चा करेंगे, पहले इन फैसलों के पीछे छिपे जोखिमों की बात। साल 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद भारतीय प्रधानमंत्रियों को लगभग हर विदेश यात्रा में ऑपरेशन ब्लू-स्टार और इस घटना की सफाई देनी पड़ती थी। पश्चिमी देशों के उदारवादी नेता आशंका जताते थे कि भारत में अल्पसंख्यकों के हित सुरक्षित नहीं हैं। कश्मीर, अनुच्छेद-370, नागरिकता कानून और राम मंदिर के मुद्दों को एक साथ हल करने में सबसे बड़ी दिक्कत यही थी कि विश्व जनमत खिलाफ न हो जाए। प्रधानमंत्री ने इसके लिए अपने प्रथम कार्यकाल से ही व्यूह रचना शुरू कर दी थी। याद करें, अबू धाबी की शेख जाएद मस्जिद में उनके फोटो देखकर आलोचक तो दूर, प्रशंसक तक भौंचक्के रह गए थे। यही नहीं, त्रिपुरा में बहुमत हासिल करने के बाद शाम के वक्त जो कार्यकर्ता सम्मेलन भाजपा मुख्यालय में हुआ था, वहां भी उनके नए रूप के दर्शन हुए थे। प्रधानमंत्री ने बोलना शुरू किया ही था कि पास की किसी मस्जिद से अजान गूंजने लगी। वह चुप हो गए। अजान पूरी होने तक वैसे ही खड़े रहे। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी इसे महसूस और अभिव्यक्त किया था। इन्हीं नरेंद्र मोदी पर आरोप लगते थे कि कभी उन्होंने मौलानाओं द्वारा भेंट दी गई टोपी पहनने से इनकार कर दिया था। दूसरा चुनाव जीतने के बाद ही ‘सबका साथ सबका विकासÓ के साथ ‘सबका विश्वासÓ भी उन्होंने जोड़ा। ‘सबकाÓ मतलब साफ था, देश के अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक, दोनों। आने वाले दिनों में कड़े फैसले लेने से पहले वह देश के अंदर और बाहर स्पष्ट संदेश दे रहे थे। यही वजह है कि जब अनुच्छेद-370 और कश्मीर के विभाजन के मुद्दे पर पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में मामला उठाने की कोशिश की, तो चीन के साथ के बावजूद उसे मुंह की खानी पड़ी। लगभग सभी प्रमुख देशों ने इसे भारत का अंदरूनी मसला बताकर कन्नी काट ली। मोदी इस मामले में अरब देशों के साथ पश्चिम को मनाने में कामयाब साबित हुए थे। कानून-व्यवस्था के लिहाज से देश के अंदरूनी मोर्चे पर भी इस सिलसिले में खासी तैयारी की गई। अनुच्छेद-370 हटाने का फैसला लेने से पूर्व जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों की तैनाती के साथ ही अमरनाथ यात्रा रोक दी गई थी। पर्यटक वापस भेजे जाने लगे थे। समझने वाले समझ चुके थे कि कुछ बड़ा होने वाला है, पर दिल्ली की हुकूमत की इस करवट का अंदाज किसी को नहीं था। फैसला लागू होते ही तमाम बड़े नेता गिरफ्तार अथवा नजरबंद कर दिए गए। उमर अब्दुल्ला को छोड़ दें, तो महबूबा मुफ्ती सहित तमाम शीर्ष कश्मीरी नेता आज भी बंदिशों में हैं। पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। जम्मू-कश्मीर के अब तक के सबसे कद्दावर नेता शेख अब्दुल्ला को 8 अगस्त,1953 को नजरबंद किया गया था। वह तब तक इस हालत में रहे, जब तक कि उन्होंने दिल्ली के दरबार से हाथ नहीं मिला लिया। उनसे करार के बाद जवाहरलाल नेहरू ने 1964 में न केवल उन्हें रिहा किया, बल्कि पाकिस्तान और अल्जीरिया में भारत के रूख-रवैये को उजागर करने के लिए भी भेजा। हुर्रियत के अलगाववादी हों या आतंकवादी अथवा राजनीतिक शख्सियतें, वे इस सूबे में हालात और सुभीते के हिसाब से अंदर-बाहर होती रही हैं। इसीलिए उनका इकबाल इतना नहीं रह बचा था कि वे ‘दिल्ली के इतने बड़े हस्तक्षेपÓ का विरोध कर सकें। जो लोग यह सोचते थे कि जम्मू-कश्मीर में कोई बहुत बड़ा प्रतिरोध होगा, वे इस एक साल में गलत साबित हुए हैं। अयोध्या का मसला इस मामले में थोड़ा अलग है। देश की सर्वोच्च अदालत ने लंबे बहस-मुबाहिसे के बाद इस पर फैसला सुनाया। पिछले 162 साल लंबे विवाद ने इस देश को ऊबा दिया था। यही वजह है कि आला अदालत के निर्णय को लोगों ने नियति की तरह स्वीकार किया। 5 अगस्त को मंदिर-निर्माण कार्यक्रम में शामिल होकर प्रधानमंत्री हिंदू आस्थावादियों को सीधा संदेश देने जा रहे हैं। यह यकीनन आने वाले चुनावों में भाजपा के लिए मददगार साबित होने जा रहा है। हमें भूलना नहीं चाहिए कि नवंबर में बिहार और फिर अगली मई तक पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में चुनाव होने हैं। ये चुनाव इस बात की मुनादी करेंगे कि भगवा पार्टी के तमाम फैसले सही साबित हुए या गलत। क्या इतना काफी है? जैसा कि मैंने शुरूआत में अनुरोध किया, राजनीतिक विजय के साथ भाजपा को सामाजिक समभाव का भी ख्याल रखना होगा। जो लोग तीन तलाक और राम मंदिर पर चुप्पी साधे रहे, वे सीएए पर कैसे उबल पड़े थे? कई स्थानों पर भड़की हिंसा में दो दर्जन से अधिक लोग मारे गए। इन फैसलों के विरोधियों ने लंबे धरने दिए, जो सरकारी कोशिशों से नहीं, कोरोना के प्रहार से खत्म हुए थे। इस तबके में आशंका पसरी है कि अयोध्या के बाद काशी और मथुरा में समान मुद्दे न उठ खड़े हों। यही नहीं, कश्मीर के विखंडन ने चीन को भी बात का बतंगड़ बनाने का मौका दिया है। वह कूटनीति के मोर्चों पर इसका प्रयोग करने की कोशिश कर सकता है। मतलब साफ है, सरकार का काम अभी बाकी है। लोकप्रियता के मामले में अटल बिहारी वाजपेयी सहित भाजपा के सभी नेताओं को मीलों पीछे छोड़ चुके नरेंद्र मोदी की असली परीक्षा सबका विश्वास जीतने की ही है। इसके साथ ही आजादी की 74वीं जयंती की ओर तेजी से बढ़ते अपने देश को इतिहास का यह सबक याद रखना होगा, सीमाएं जब सुलग रही हों, तब सामाजिक ताने-बाने की मजबूती का महत्व और बढ़ जाता है।


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