Thursday , 18 October 2018
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‘क्रांतिकारी’ संत तरूण सागर का निधन

1988 में बांसवाड़ा के बागीदौरा में ली थी मुनि दीक्षा
नई दिल्ली। जैन मुनि और राष्ट्र संत तरूण सागर जी महाराज (51) नहीं रहे। उनका समाधिमरण शनिवार तड़के 3:18 बजे कृष्णानगर स्थित राधेपुरी दिगंबर जैन मंदिर में हुआ। वे कुछ समय से बीमार थे। उनकी अंतिम यात्रा दिल्ली से 28 किमी दूर गाजियाबाद के मुरादनगर पहुंचीं। यहां दिल्ली-मेरठ हाईवे पर तरूणसागरम तीर्थ में शाम को मुनि सौरभ सागर जी के सानिध्य में अंतिम संस्कार विधि पूरी की गई। संत तरूण सागर को 20 जुलाई 1988 को राजस्थान के उदयपुर संभाग के बांसवाड़ा जिले के बागीदौरा गांव में 20 वर्ष की उम्र में उनके गुरु पुष्पदंत सागर ने उन्हें दिगंबर संत की उपाधि दे दी।
तरुण सागर जी को करीब तीन हफ्ते पहले पीलिया हो गया था। इसके बाद उन्हें यहां मैक्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था। स्वास्थ्य सुधरता ना देख उन्होंने इलाज कराना बंद कर दिया था और चातुर्मास स्थल पर जाने का निर्णय लिया था। गुरुवार सुबह उनकी तबीयत बिगड़ी। इसके बाद उन्हें दोबारा अस्पताल ले जाया गया। इसके बाद अपने गुरु पुष्पदंत सागर महाराज की स्वीकृति के बाद संलेखना (आहार-जल न लेना) लेने का फैसला किया। मुनिश्री के निधन पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुख जताया।
क्रांतिकारी संत कहलाते थे
अपने प्रवचनों के वजह से वे ‘क्रांतिकारी संतÓ कहलाते थे। 6 फरवरी 2002 को इन्हें मध्य प्रदेश शासन द्वारा ‘राजकीय अतिथिÓ का दर्जा मिला। इसके बाद 2 मार्च 2003 को गुजरात सरकार ने भी उन्हें ‘राजकीय अतिथिÓ के सम्मान से नवाजा। जैन धर्म में ही नहीं उनके शिष्यों की संख्या दूसरे समुदायों में भी काफी है।

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