Friday , 24 May 2019
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एमपीयूएटी में डिप्लोमा कोर्स घोटाला

बिना टेंडर, प्रक्रिया के चहेती कंपनी को सौंपा काम
1000 अभ्यर्थियों की भर्ती का टारगेट
600 को पढ़ा रहे कोर्सकुल भर्ती की फीस का महज 15 प्रतिशत
विवि को कमाई बाकी पैसा कंपनी की जेब में
आनंद शर्मा & उदयपुर
पहले से कई घोटालों की मार और 1100 पेंशनरों की पेंशन को तरस रहे महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में चालू शैक्षणिक सत्र में ही डिप्लोमा ऑफ एग्री इनपुट डीलर का कोर्स घोटाला हुआ है। यह कोर्स सम्पूर्ण रूप से सक्षम होने के बावजदू विश्वविद्यालय ने नहीं पढ़ाकर सीधे एक बार में ही एक कंपनी को इसकी जिम्मेदारी सौंप दी। जबकि इसके लिए विवि ने एक अदद कोई टेण्डर तक नहीं किया और न ही सक्षम विभाग की कोई सहमति ली।
आरसीए ने चालू सत्र के लिए अगस्त 2018 में दो कोर्स चलाने के लिए सीधे ही मैसर्स क्रिस्पर सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी को आदेश दे दिया और उससे एमओयू तक कर लिया। सरकारी नियमों के अनुसार इस कोर्स को कराने के लिए 1 हजार विद्यार्थियों को लेने का लक्ष्य रखा गया है। अब तक 600 विद्यार्थियों ने 20 हजार रुपए के हिसाब से फीस भी जमा करवा दी।
इस राशि के अलावा जीएसटी और विश्वविद्यालय द्वारा कराई जाने वाली परीक्षा का 3 हजार रुपए शुल्क अलग से है। इस हिसाब से कंपनी 1 हजार विद्यार्थियों पर सीधे 2 करोड़ रुपए की कमाई करने जा रही है। इस एकवर्षीय डिप्लोमा का कोर्स पढ़ाया भी जा रहा है। आरसीए ने जो एमओयू किया, उसके तहत इस कोर्स की कुल फीस का 15 प्रतिशत पैसा या राशि कंपनी विवि को उसके कोष में जमा कराएगी। जबकि विवि की दूसरी तस्वीर यह है कि विवि के पास यूजी, पीजी की तमाम फैकल्टी, आधारभूत ढांचा, क्लासरूम, बिजली, पानी की सुविधाएं होने के बावजूद उसने कोर्स नहीं पढ़ाकर सीधे चुपके से एक बार में ही बिना कोई टेण्डर प्रक्रिया किए या अखबारों में विज्ञापन प्रकाशित किए या प्रचार किए सीधे मैसर्स क्रिस्पर कंपनी को काम सौंपकर उससे
एमओयू कर लिया। इस घोटाले
की पूरे विश्वविद्यालय में दबी जुबान में खासी चर्चा है।एमओयू के अनुसार विवि सुविधाएं भी देगा
क्रिस्पर कंपनी से किए एमओयू के तहत बिजली, पानी, क्लासरूम आदि सभी सुविधाएं भी विश्वविद्यालय कंपनी को देगा। इससे साफ है कि कंपनी को ज्यादा कुछ नहीं करना है। परीक्षा भी विवि कराएगा। यानि कमाई केवल कंपनी करेगी और सुविधाएं विवि देगा और बस 15 प्रतिशत पैसा ही उसे मिलेगा। जबकि विवि के पास यह कोर्स कराने, पढ़ाने के सभी प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर आदि उपलब्ध हैं।बोम में हंगामा हुआ तो अब 15 से बढ़ाकर 30 प्रतिशत पैसा लेने की तैयारी
इस कोर्स को सीधे ही किसी कंपनी को सौंप देने और उसके पेटे महज 15 प्रतिशत पैसा ही लेने का मामला एजेंडे के रूप में बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट की बैठक में गया तो एक बोम सदस्य ने इस पर कड़ी आपत्ति जता दी। बोम की हाल ही 21 दिसम्बर को बैठक हुई, जिसमें सदस्य प्रवीण सिंह ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। उस पर अपनी गलतियां छिपाने के लिए अब विवि कंपनी से 15 की बजाय 30 प्रतिशत पैसा वसूलने की तैयारी कर रहा है। इसके सक्षम आदेश भी गुरुवार को ही स्थानांतरित और रिलीव हो चुकी रजिस्ट्रार प्रियंका जोधावत ने जारी किए।घोटाले के लिए बहाई उल्टी गंगा
सरकारी विभागों में कायदे से कोई काम करवाने के लिए पहले प्रस्ताव चलाकर सक्षम मंजूरी ली जाती है और फिर टेण्डर जारी किए जाते हैं लेकिन विवि में इस कोर्स को क्रिस्पर कंपनी से कराने के लिए अगस्त 2018 में सीधे ही एमओयू कर लिया गया। फिर इसका प्रस्ताव चलाकर 10 दिसम्बर को एकेडमिक कौंसिल की बैठक में बतौर एजेण्डा पेश किया गया। एकेडमिक कौंसिल ने इस पर आपत्ति करने की बजाय एक बार में मान्य कर लिया और फिर सबसे बड़ी सक्षम कमेटी बोम में इस मामले को 21 दिसम्बर को पेश किया गया, जिसमें आपत्तियां उठ गई। क्रिस्पर कंपनी को कोर्स चलाने की अपने स्तर पर सीधे इजाजत और एमओयू करने की कार्रवाई आरसीए डीन अरुणाभ जोशी ने की। जोशी ने न ही वीसी, रजिस्ट्रार तक फाइल चलाई और न ही पहले बोम की इजाजत ली। इससे विवि पूरी तरह संदेह के घेरे में आ चुका है।

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