Monday , 22 October 2018
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अर्थशास्त्रियों के पोल का नतीजा

विकास दर नहीं, तेल की कीमतें असली चुनौती

बेंगलुरू। सरकार के बढ़ते खर्च की वजह से 2019 के आम चुनावों से पहले इस साल भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार रहेगी। ऐसे में मोदी सरकार के लिए आर्थिक विकास दर के फ्रंट पर चिंता की कोई बात नजर नहीं आ रही, लेकिन तेल की बढ़ती कीमतों में इस संभावना को धूमिल कर सकती हैं। अर्थशास्त्रियों के बीच रॉयटर्स के एक पोल में इस तरह की आशंकाएं सामने आईं हैं।
भारत की 2 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की इकॉनमी ने हाल में ही फ्रांस को पछाड़ छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का मुकाम हासिल किया है। मार्च 2019 में खत्म होने वाले इस वित्तीय वर्ष में इसके 7.4 फीसदी की दर से बढऩे का अनुमान है। 19 से 24 जुलाई के बीच करीब 70 अर्थशास्त्रियों के बीच हुए पोल में अगले वित्तीय वर्ष में भी औसत विकास दर के 7.6 फीसदी रहने की उम्मीद जताई गई है।
इसी पोल में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी चीन की अर्थव्यवस्था के इस साल 6.6 फीसदी की गति से बढऩे की संभावना जताई गई है। लेकिन अर्थशास्त्रियों ने डीजल और पेट्रोल की रेकॉर्ड बढ़ती कीमतों को लेकर अंदेशा जताया है। भारत के आयात बिल का सबसे बड़ा हिस्सा पेट्रोलियम आयात ही है और अगर बढ़ती कीमतें इकॉनमी को लेकर इन अच्छी संभावनाओं के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा हैं।
कई अर्थशास्त्रियों ने तेल की बढ़ती कीमतों को सबसे बड़ा खतरा माना है। उन्होंने अनुमान जताया है कि इस वजह से आरबीआई इंट्रेस्ट रेट में इजाफा कर सकता है। एएनजेड के इकनॉमिस्ट शशांक ने कहा कि हमारे मुताबिक तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर की वृद्धि भारत की विकास दर को 30-40 बेसिस पॉइंट्स तक घटाएगी। इसका नतीजा कम खपत और इनपुट कॉस्ट में बढ़ोतरी के रूप में देखने को मिलेगा।
बता दें कि नवंबर 2016 में नोटबंदी के दौरान लगे झटके के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था इस साल जुलाई में इससे उबरती नजर आई। पिछले साल 5.6 फीसदी की तुलना में हालिया क्वॉर्टर्स में 7 फीसदी से अधिक की ग्रोथ रेट देखने को मिली। सिटी के सीनियर इकनॉमिस्ट समीरन चक्रवर्ती ने कहा कि तुलना रूप से ऊंचे इंट्रेस्ट रेट, तेल की बढ़ी हुई कीमतें, एक्सचेंज रेट को लेकर अनिश्चितता मिलकर 2019 के चुनावों से पहले चुनौती तैयार कर रहीं हैं।

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