Thursday , 21 June 2018
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किडनी हटाए बिना कैंसर की गांठ निकाली

गीतांजली हॉस्पिटल के यूरोलोजिस्ट डॉ. पंकज त्रिवेदी ने की सफल सर्जरी

उदयपुर। गीतांजली हॉस्पिटल के यूरोलोजिस्ट डॉ पंकज त्रिवेदी व टीम ने किडनी हटाए बिना उस पर फैल रही कैंसर की गांठ को सफलापूर्वक हटा कर चिकित्सा जगत में नया कीर्तमान रच दिया। ऐसे अत्यंत दुर्लभ और जटिल ऑपरेशन अब तक देश के चुनिंदा अस्पतालों में ही हो रहे थे। इस सफलता से मेवाड़ के आदिवासी अंचल के किडनी कैंसर से पीड़ित रोगियों में आशा की नई किरण जगी है कि उन्हें किडनी रिमूव करवाए बिना सर्वोत्तम चिकित्सा उपचार मिल जाएगा।
विशेष प्रशिक्षण प्राप्त यूरोलॉजिस्ट डॉ. त्रिवेदी ने विश्व किडनी दिवस पर आयोजित प्रेसवार्ता में बताया कि जमनालाल (68) की दायीं किडनी में 5.2 सेंटीमीटर की कैंसर की गांठ व बालाबाई (45) की बायीं किडनी में 4.5 सेंटीमीटर की कैंसर की गांठ को निकाल कर 60 प्रतिशत तक किडनी बचा ली गई। पेशाब में खून, उच्च रक्तचाप व सांस की तकलीफ के कारण जमनालाल ने चिकित्सकीय परामर्श लिया। वहीं बाला बाई की सोनोग्राफी की जांच में इस गांठ का पता चला। इसके बादा दोनों रोगियों ने सीटी स्केन की जांच कराई जिसमें किडनी में कैंसर की गांठ होने का पता चला। किडनी में कैंसर को देखते हुए रोगियों को कई अस्पतालों ने पूरी किडनी निकालने की सलाह दी। डॉ.पंकज त्रिवेदी ने बारीकी से सीटी स्केन की जांच कर अध्ययन किया व किडनी में से कैंसर की गांठ को निकाला तो निकाला ही, दोनों रोगियों की किडनी को भी बचा लिया। इस टीम में उनके साथ यूरोलोजिस्ट डॉ. विश्वास बाहेती, एनेस्थेटिस्ट डॉ.उदय प्रताप, ओटी स्टाफ पुष्कर, अविनाश, जयप्रकाश एवं प्रवीण ने सहयोग दिया।
बहुत जटिल था मामला
कैंसर गांठ किडनी के मध्य भाग में रक्त वाहिकाओं एवं मूत्र संग्रहण स्थल के पास थी। इसे निकालने के लिए किडनी की मुख्य धमनी सहित कई छोटी-बड़ी धमनियों व शिराओं को ब्लॉक किया गया ताकि किडनी से रक्तस्त्राव को रोका जा सके। गौरतलब है कि शिराओं को 30 मिनट से अधिक ब्लॉक करने पर पूरी किडनी खराब होने का खतरा हो जाता है। गांठ पेल्वीकेलिसियल सिस्टम (मूत्र संग्रहण स्थल) तक फैली हुई थी इसलिए रिपेयर करना भी जरूरी था। इस अत्यंत दुरुह प्रक्रिया को निर्धारित समय सीमा याने केवल 30 मिनट में ही पूरी करना काफी चुनौतीपूर्ण था। कैंसर गांठ व सामान्य उत्तक को निकालने के बाद किडनी का जो खाली हिस्सा था उसे इसी समय सीमा में जेलफोम एवं सर्जी सेल से भरा गया। इस प्रकार 60 प्रतिशत तक किडनी को बचा लिया गया। पेल्वीकेलिसियल सिस्टम को भी रिपेयर करना जरूरी था अन्यथा मूत्र किडनी से लीक होना शुरू हो जाता। किडनी को निकालना नहीं बचाना पहली प्राथमिकता
डॉ. त्रिवेदी ने बताया कि मेडिकल गाइडलाइंस-2015 के अनुसार ऐसे मामलों में किडनी को बचाने का हर संभव प्रयास करना चाहिए। यदि किडनी का केवल 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा ही बच रहा होता है तो भी उसे बचाना ही प्राथमिकता है ताकि दूसरी किडनी की कार्यप्रणाली पर भार न पड़े। मगर दुर्भाग्य से आज भी इस प्रकार के 80 प्रतिशत रोगियों की किडनी को निकाल दिया जाता है जबकि उचित प्रशिक्षण एवं कौशल से किडनी को बचाया जाना संभव है।
पूरी किडनी निकालते तो क्या होता ?
डॉ. त्रिवेदी ने बताया कि मेडिकल रिसर्च में पाया गया है कि जिन मरीजों के किडनी में कैंसर के कारण किडनी निकाल दी जाती है उनमें दूसरी किडनी पर कार्यभार बढ़ जाता है। जो कार्य दो किडनियां मिल कर रही थीं अब वह एक ही किडनी करेगी जिससे भविष्य में उस किडनी की भी कमजोर होने की संभावना बढ़ जाती है। उम्र बढ़ने के साथ मधुमेह, उच्च रक्तचाप एवं पथरी रोग भी किडनी को खराब कर सकते हैं जिससे किडनी की कार्यप्रणाली और कम हो जाती है एवं रोगी को डायलिसिस पर रहना पड़ सकता है।
दुबारा कैंसर होने का खतरा न्यूनतम
कैंसर की गांठ को निकालने के बाद समय-समय पर रोगी की पेथोलोजी जांचें कराई जाती हैं जिससे कैंसर की पुनरावृत्ति की पुष्टि की जा सके। अब तक ऐसे मामलों में 98 प्रतिशत तक रोगियों में दुबारा कैंसर नहीं पाया गया। रोगी की भी पैथोलोजी जांचें कराई गई जिससे कैंसर की गांठ शरीर के किसी अन्य अंग में नहीं पायी गई। अधिकतम किडनी को बचाने पर क्रियेटिनिन के बढ़ने की संभावना भी काफी कम हो जाती है। डॉ. त्रिवेदी अब तक तीन मरीजों का इसी प्रक्रिया से उपचार कर चुके हैं जो स्वस्थ एवं रोगमुक्त हैं। किडनी में से कैंसर की गांठ को निकालने के लिए अनुभवी व कुशल सर्जन की टीम, अत्याधुनिक आईसीयू एवं ऑपरेशन थियेटर की जरूरत होती है जो तीनों ही सुविधाएं गीतांजली हॉस्पिटल में उपलब्ध है।

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