Thursday , 23 November 2017
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रोहिंग्या को निकालें बाहर, आतंकी खतरा

नई दिल्ली। गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेश को अवैध तरीके से रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों की पहचान करने के लिए एडवाइजरी जारी किया है। अब भारत मे अवैध तरीके से रह रहे रोहिंग्या की पहचान कर बाहर निकाला जाए. एडवाइजरी में रोहिंग्या मुसलमानों से खतरे की बात भी कही गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों का मुद्दा उठाने के बाद यह एडवाइजरी सामने आई है।
सूत्रों के मुताबिक आतंकी संगठन रोहिंग्या मुसलमानों को भारत के खिलाफ आतंकी घटनाओं में इस्तेमाल कर सकते हैं। वर्तमान में भारत मे अवैध तरीके से 40 हजार रोहिंग्या अलग-अलग राज्यों में रह रहे हैं। बताया जा रहा है कि रोहिंग्या मुसलमान ज्यादातर जम्मू कश्मीर, हैदराबाद, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली एनसीआर और राजस्थान में रह रहे हैं। भारत में सबसे ज्यादा रोंहिग्या मुस्लिम जम्मू में बसे हैं, यहां करीब 10,000 रोंहिग्या मुस्लिम रहते हैं।
भारत सरकार के सामने 40 हजार रोहिंग्या मुस्लिमों की रोजी-रोटी से कहीं बड़ा सवाल देश की सुरक्षा का है, जो सर्वोपरि है। सरकार को रोटी, कपड़ा और मकान की दिक्कतों से जूझते रोहिंग्या आबादी के आतंकी संगठनों के झांसे में आसानी से आ जाने की आशंका है। सरकार को ऐसे खुफिया इनपुट भी मिले हैं कि पाकिस्तान से ऑपरेट कर रहे टेरर ग्रुप इन्हें अपने चंगुल में लेने की साजिश में लग गए हैं। ऐसे में सरकार भारत में शरण ले चुके 40 हजार रोहिंग्या शरणार्थियों को 40 हजार बारूद के ढेर के संभावित खतरे के तौर पर देख रही है।आखिर कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान ?
म्यांमार के रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय को दुनिया का सर्वाधिक प्रताडि़त अल्पसंख्यक समुदाय माना जा रहा है। रोहिंग्या सुन्नी मुस्लिम हैं, जो बांग्लादेश के चटगांव में प्रचलित बांग्ला बोलते हैं। अपने ही देश में बेगाने हो चुके रोहिंग्या मुस्लिमों को कोई भी देश अपनाने को तैयार नहीं। म्यांमार खुद उन्हें अपना नागरिक नहीं मानता। म्यांमार में रोहिंग्या की आबादी 10 लाख के करीब है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक करीब इतनी ही संख्या में रोहिंग्या बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान सहित पूर्वी एशिया के कई देशों में शरण लिए हुए हैं।
रोहिंग्या समुदाय 15वीं सदी के शुरूआती दशक में म्यांमार के रखाइन इलाके में आकर बस तो गया, लेकिन स्थानीय बौद्ध बहुसंख्यक समुदाय ने उन्हें आज तक नहीं अपनाया है। म्यांमार में सैन्य शासन आने के बाद रोहिंग्या समुदाय के सामाजिक बहिष्कार को बाकायदा राजनीतिक फैसले का रूप दे दिया गया और उनसे नागरिकता छीन ली गई। साल 2012 में रखाइन में कुछ सुरक्षाकर्मियों की हत्या के बाद रोहिंग्या और बौद्धों के बीच व्यापक दंगे भड़क गए। तब से म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ हिंसा जारी है।

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