Monday , 27 March 2017
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पाकिस्तान को अमेरिकी मदद में कमी की भरपाई कर रहा है चीन

वॉशिंगटन। पाकिस्तानी नेता अक्सर अपने सदाबहार दोस्त चीन के साथ ‘शक्कर जैसी मिठासÓ वाले रिश्तों का राग गाते रहते हैं। हालांकि अमेरिका के साथ सुविधा वाले रिश्तों का अब पाकिस्तान में उतना जिक्र नहीं होता है। ट्रंप प्रशासन जब अपने मुख्य साझेदार के प्रति नीतियों को अंतिम रूप देने की कोशिश करेगा तब उसे महसूस होगा कि पाकिस्तान अब पेइचिंग की गोद में बैठा हुआ है और उसने 2030 तक ऊर्जा, इन्फ्रास्ट्रक्चर और उद्योग के क्षेत्र में 46 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया है। यह इतनी राशि है जो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकती है।
दूसरी तरफ वॉशिंगटन का इस्लामाबाद पर प्रभाव कम होता दिख रहा है। अमेरिका के कई नीतिनिर्माता पाकिस्तान को आतंकवादियों के पनाहगाह के रूप में देखते हैं। उनके मुताबिक 9/11 हमले के बाद पाकिस्तान को सुरक्षा और आर्थिक मदद के तौर पर 30 अरब डॉलर की सहायता दी गई जिसका कोई फायदा नहीं मिला है। हालांकि अगर अमेरिका पाकिस्तान से पूरी तरह किनारा करता है तो क्षेत्रीय संतुलन के लिहाज से मामला उलझ सकता है।
पाकिस्तान में विपक्ष के नेता बिलावल भुट्टो ने अपने हालिया वॉशिंगटन दौरे में कहा था, मुझे ऐसा महसूस होता है कि हम (पाकिस्तान और अमेरिका) एक बार फिर ऐसे सहयोगी बन चुके हैं जो अलग हो सकते हैं। दरअसल 2011 में अमेरिकी कमांडोज ने पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था, उसके बाद से ही पाकिस्तान को अमेरिकी मदद घटती जा रही है और दोनों के रिश्तों में खटास बढ़ती जा रही है। इसके अलावा जिस तरह अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी सिकुड़ रही है, पाकिस्तान का अमेरिका के लिए महत्व भी घट रहा है और वह प्राथमिकता में नीचे पहुंच गया है। पाकिस्तान को अमेरिकी मदद में अभी और गिटावट तब आएगी जब राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप दूसरे देशों के मदद के बजट को नाटकीय तौर पर कम करने के अपने प्रस्ताव पर अमल करेंगे।

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